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महाराजा रणजीत सिंह की विरासत: पाकिस्तान में स्थापित प्रतिमा ने छेड़ी नई बहस

महेंद्र वेद Updated Wed, 10 Jul 2019 07:02 AM IST
महाराजा रणजीत सिंह
महाराजा रणजीत सिंह - फोटो : file photo
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बीते 27 जून को लाहौर किले में महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा स्थापित की गई, जहां से उन्होंने पश्चिमोत्तर भारत के एक बड़े हिस्से पर शासन किया, इससे हो सकता है कि भारत और पाकिस्तान, दोनों के पंजाब प्रांत में खुशी की थोड़ी लहर चले। लेकिन पाकिस्तान में इस अभूतपूर्व घटना ने एक वास्तविक बहस छेड़ दी है। इस पर उठाए जा रहे कई सवालों में से एक सवाल यह है कि एक इस्लामी गणराज्य को क्यों एक ऐसे शासक की प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए, जो 18वीं शताब्दी के पंजाब की तीन मुख्यधाराओं-मुस्लिम, हिंदू और सिख में से एक का प्रतिनिधित्व करता था।
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स्थानीय स्तर पर तैयार इस प्रतिमा का खर्च ब्रिटेन स्थित एक सिख संगठन ने वहन किया है। महाराजा की 180वीं पुण्यतिथि पर इसका अनावरण पाकिस्तान में किया गया, जो भारत के साथ करतारपुर सिख गुरुद्वारे तक एक गलियारा बनाने का काम कर रहा है, लेकिन भारत को व्यापाक द्विपक्षीय वार्ता की मेज पर लाने में अक्षम रहा है।

पाकिस्तान के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री ने उक्त अवसर पर ट्वीट किया कि आज पंजाब के महान राजा महाराजा रणजीत सिंह की 180वीं पुण्यतिथि है, जिन्होंने काबुल से दिल्ली तक जुझारूपन के साथ शासन किया, पंजाबी वर्चस्व के प्रतीक महाराजा को शासन में सुधारों के लिए याद किया जाएगा। इस ट्वीट के 'जश्न वाले' लहजे पर सवाल उठाते हुए लाहौर स्थित एक शिक्षाविद अली उस्मान कासमी ने मंत्री के ट्वीट की 'तथ्यात्मक त्रुटियों' की ओर इशारा किया। महाराजा रणजीत सिंह ने अविभाजित पंजाब, जम्मू, कश्मीर और लद्दाख के ज्यादातर हिस्सों (संपूर्ण हिस्से पर नहीं) पर शासन किया, लेकिन उन्होंने कभी काबुल और दिल्ली पर शासन नहीं किया।

प्रतिमा ने कोई विवाद नहीं फैलाया है और न ही इस पर कोई सार्वजनिक बहस है, हालांकि किले के शहर लाहौर के प्राधिकरण ने व्यापक परामर्श के बिना इसे स्थापित करने का फैसला लिया। कासमी का मानना है कि इसका मकसद व्यावसायिक है कि किले को देखने के लिए आने वाले पर्यटक प्रतिमा को देखने के लिए भुगतान करेंगे। इस बात को लेकर लोगों की राय अलग-अलग है कि क्या यह अच्छा है और पाकिस्तान के बाहर इसका क्या संदेश जाएगा।
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