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सुनते-सुनते बनी कहानी, कथा संसार से परिचय करा रही हैं क्षमा शर्मा

Kshama Sharma क्षमा शर्मा
Updated Wed, 30 Sep 2020 12:49 AM IST
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सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : बासित जरगर

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हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी ने अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में बच्चों को कहानी सुनाने पर जोर दिया। उन्होंने दादा-दादी, नाना-नानी से सुनी कहानियों को बच्चों के जीवन के लिए जरूरी बताया। दक्षिण भारत की कई कहानी सुनाने वाली महिलाओं से परिचय भी कराया। एक महिला ने तेनालीराम की कहानी सुनाई।
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असल में कहानी सुनाने की कला हमारे लोक जीवन में ही रची- बसी है। हर उत्सव-त्योहार की कोई न कोई कहानी मौजूद है। कहानी सुनाकर बच्चों में जीवन जीने की कला विकसित की जाती रही है। पंचतंत्र में तो तीन राजकुमारों को जानवरों के जरिये ही नीति कथाएं सुनाई गई हैं।


सिर्फ पंचतंत्र ही नहीं, कथा सरित्सागर, महाभारत, रामायण सभी तो कहानियों के असीमित भंडार हैं। एक कहानी के साथ बीच में चलती असंख्य अवांतर कथाएं भी हैं। ये कहानियां चाहे राजा-रानी की हों, परीकथाएं हों, पशु-पक्षियों की हों, प्रकृति से जुड़ी हों, जादू की हों, सभी का मूल स्वर बुराई पर अच्छाई की विजय ही है।

लोककथाओं में भी आम तौर पर इसी अवधारणा को पुष्ट किया जाता है। दादी-नानी जब इसे सुनाती हैं, तो अपने जीवन के अनुभवों से इन्हें अधिक समृद्ध करती हैं। हर कहानी को सुनने वाले बच्चे क्यों, कहां, किसलिए के सवालों से भरे रहते हैं। हर कहानी उनमें कुतूहल, जिज्ञासा, ऐसा भी होता है, ऐसा कैसे हो गया आदि के भाव जगाती है।

साहस से भरी कहानियां, भूतों के कारनामे भी बच्चों को बहुत पसंद आते हैं। हमारी स्मृतियों से जुड़ी कोई घटना, किसी पेड़, किसी पालतू के जीवन से जुड़ा कोई प्रसंग भी उन्हें बहुत लुभाता है। कहानी सुनाते वक्त अभिनय और सुरों के उतार –चढ़ाव का भी बच्चे बहुत आनंद उठाते हैं।

इस लेखिका के जीवन के चार दशक अपने देश के विभिन्न शहरों में अनेक संगठनों से जुड़कर बच्चों को कहानी सुनाते ही बीते हैं। अगर माइक के सामने आप बच्चों को पहले से तैयार कोई कहानी सुनाने लगें, तो उन्हें वह ज्यादा पसंद नहीं आती। वे जल्दी ही बोर हो जाते हैं।

इसलिए कहानी सुनाने वाला सिर्फ कहानी सुनाए ही नहीं, वह बच्चों की कहानी का श्रोता भी हो। इसलिए कहानी सुनाना शुरू करते ही, बच्चों को उसमें यदि शामिल किया जाए, तो वे बहुत उत्साह से उसमें भाग लेते हैं। कई बार तो उनकी कल्पनाएं इतनी उड़ान भरती हैं कि चकित रह जाना पड़ता है। उनकी कल्पना किसी देश-काल में ठहरती नहीं।

हो सकता है कि वे एक पल में सैकड़ों वर्ष पहले पहुंच जाएं और अगले ही पल अपने सदियों पुराने पात्र के हाथ में मोबाइल पकड़ा दें और शाहरुख खान, या रणबीर सिंह की किसी फिल्म का गाना गवाते हुए, उस पर नृत्य करा दें। किसी परी को ट्रंप के चुनाव में शामिल करा दें।

आज के सूचना समाज में बच्चे भी इससे अछूते नहीं हैं। वे अपनी सूचनाओं को अपनी कहानी के पात्र से जोड़ते हैं और उनसे अनोखे करतब कराते हैं। एक बार जयपुर में नेशनल बुक ट्रस्ट का पुस्तक मेला वहां के एक नामी स्कूल में लगा हुआ था। वहां के स्टोरी टेलिंग सेशन में बड़ी संख्या में बच्चे मौजूद थे।

जब कहानी शुरू हुई, तो आसपास के पेड़, मेज, माइक सभी कहानी के पात्र बन गए। बच्चे कहानियों का पीछा करने लगे। कहानी के अंदर एक बंदर का आगमन हुआ, जो कि स्कूल के भीतर लगे पेड़ पर रहता था। लेकिन बेचारा गरमी से बहुत परेशान था। तो आखिर इसे गरमी से कैसे बचाया जाए।

बच्चों की कल्पना तुरंत ही उस बंदर को गरमी से बचाने दौड़ी। उन्होंने फौरन पीपल के पेड़ पर एसी लगवा दिया। बच्चों की इस परिकल्पना से वहां उपस्थित लोग हंस-हंसकर दोहरे हो गए। एक बार दिल्ली में एक बच्ची आई और उसने अपना गाल सामने कर दिया कि यहां अपना आटोग्राफ दीजिए। मगर जब तुम अपना मुंह धोओगी, तो मिट जाएगा न।

बच्ची बोली- आप करें तो सही। अब क्या किया जाए। उसके गाल में कहीं पेन चुभ गया तो। धीरे-धीरे बालपाइंट से उसके गाल पर दस्तखत किए। बच्ची के दोस्त ने गाल का फोटो खींचा और लगभग चुनौती देते हुए कहा-देखिए मैडम, अब तो इसका फोटो खींच लिया। अब यह कभी नहीं मिटेगा। बच्चों की कल्पना कहानियों से भी ज्यादा तेज दौड़ती है। उसे बनाए रखना चाहिए।

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