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अनुच्छेद 370 का हटना : कश्मीर से मतलब कश्मीरियों से नहीं

रीतिका खेड़ा Updated Sun, 11 Aug 2019 10:55 AM IST
प्रतीकात्मक तस्वीर
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
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जब हमारे देश के लोग अंग्रेजी हुकूमत से आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे, तो हम उनसे एक नैतिक हक मांग रहे थे कि भारतीयों को खुद के निर्णय लेने का हक होना चाहिए यानी राइट टू सेल्फ डेटर्मिनेशन। तब हमारी मांग यह थी कि भारतीय लोगों की राय ही (अंग्रेजों की नहीं) यह तय करेगी कि यहां किसका राज हो।
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कश्मीर जब भारत के साथ चलने के लिए तैयार हुआ, तब उसने कुछ शर्तें रखी थीं। उसमें से एक शर्त थी यह हक (राइट टू सेल्फ डेटर्मिनेशन) जताने का मौका उसे भी दिया जाएगा। हमारी आजादी की लड़ाई 1947 में खत्म हो गई, लेकिन कश्मीरियों के लिए जारी रही। कश्मीर में कश्मीर वादी के सुन्नी, कश्मीरी पंडित, लद्दाख के बौद्ध लोग, कारगिल के शिया, जम्मू के हिंदू और अन्य समुदाय (सिख भी!) के लोगों के भविष्य का सवाल है। 

वहां का इतिहास और वर्तमान पेचीदा है, वह किन शर्तों पर भारत में शामिल हुआ, हम न जानें, लेकिन हमें यह तो पता ही है कि वहां संघर्ष चल रहा है। कश्मीर के कई लोग अपने आप को न भारत का और न ही पाकिस्तान का हिस्सा मानते हैं। लेकिन बीते पांच अगस्त, 2019 को जब कश्मीरियों के बारे में केंद्र सरकार ने फैसला लिया, तो वही हक कश्मीरियों से पूरी तरह से छीन लिया गया।

पांच अगस्त, 2019 को जो हुआ, उसका नैतिकता के अलावे कानूनी पक्ष भी है। जब कश्मीर ने भारत के साथ जुड़ने का फैसला किया, तो उसने कई शर्तें रखी थीं। अनुच्छेद 370 के तहत अंदरूनी मामलों में कश्मीर को अपने नियम-कानून बनाने की आजादी दी गई थी। एक शर्त थी कि अनुच्छेद 370 में कोई बदलाव करने से पहले राज्य की 'संविधान सभा' की सहमति लेनी होगी। 

चूंकि जम्मू-कश्मीर अलग था, उनकी खुद की संविधान सभा थी, और जनवरी, 1957 में जब उसे भंग किया गया, तब न तो अनुच्छेद 370 को बदला गया और न ही उसे रद्द किया गया। इससे अनुच्छेद 370 एक तरह से 'स्थायी' हो गया।
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