भारत पाकिस्तान के बीच जाधव

मारूफ रजा Updated Mon, 08 Jan 2018 11:56 AM IST
कुलभूषण और उसके परिजन
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कश्मीर मुद्दे को गर्माए रखने और नियंत्रण रेखा पर तनाव बनाए रखने के पाकिस्तान के मौजूदा प्रयासों के अलावा जो एक मुद्दा नए साल में भारत और पाकिस्तान के रिश्तों को परिभाषित करेगा, वह है सेवानिवृत्त नौसैनिक अधिकारी कमांडर कुलभूषण जाधव का भाग्य, जिन्हें ईरान के चाबहार से अगवा कर लिया गया था (जैसा कि पाकिस्तानी पत्रकारों और राजनयिकों ने बताया)। जबकि पाकिस्तान ने बलूचिस्तान में दशकों से चल रहे विद्रोह के पीछे भारत का हाथ बताते हुए जाधव की गिरफ्तारी को उसी सिलसिले में दिखाया है। जाधव को पाकिस्तानी कंगारू कोर्ट ने कथित जासूसी और पाकिस्तान के खिलाफ, मुख्य रूप से बलूचिस्तान में गुप्त गतिविधियों के आरोप में मौत की सजा सुनाई, हालांकि पाकिस्तान की इस कहानी में कई खामियां हैं। बलूच की समस्या उतनी ही पुरानी है, जितना पुराना पाकिस्तान है (अकबर अहमद ने द थ्रिस्टल ऐंड द ड्रोन में इसका जिक्र किया है) और यह समस्या जाधव के जन्म से भी पहले से है।
इसलिए हैरानी की बात नहीं कि भारत सरकार जाधव के पक्ष में खड़ी हुई और पाकिस्तान के खिलाफ गुस्से का प्रदर्शन किया। जबकि आम तौर पर सरकारें जासूसों के पक्ष में खड़ी नहीं होतीं। नई दिल्ली ने पाकिस्तान को विएना सधि के उल्लंघन (जिस पर उसने दस्तखत किया है) के लिए अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में घसीटा, क्योंकि उसने भारतीय नागरिक जाधव तक भारत की राजनयिक पहुंच से इन्कार कर दिया। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने कमांडर जाधव की मौत की सजा पर रोक लगा दी। कमांडर जाधव के खिलाफ मौत की सजा सुनाने में पाकिस्तान के आला सैन्य अधिकारियों का हाथ था। कई महीनों की टालमटोल के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर  अपनी छवि सुधारने के लिए पाकिस्तान ने जाधव की मां और पत्नी को उनसे मिलने की इजाजत दी। लेकिन स्थानीय मीडिया को इसमें शामिल करने तथा इस मुलाकात के गलत प्रबंधन ने भारत को नाराज कर दिया। नतीजतन अपनी सकारात्मक छवि बनाने की पाकिस्तान की कोशिश का मजाक बन गया। यही नहीं, कमांडर जाधव को अपनी मराठी भाषी मां से अंग्रेजी में बात करने के लिए मजबूर किया गया, जिससे संदेह पैदा हुआ। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने संसद में इस मुद्दे पर बयान देते हुए कड़े शब्दों में नाराजगी व्यक्त की और कहा कि जाधव की पत्‍नी ही नहीं, मां की भी बिंदी, चूड़ियां और मंगलसूत्र उतरवा लिए गए थे। इस पर कांग्रेस सांसद गुलाम नबी आजाद ने कहा कि हमें जाधव की सुरक्षा की चिंता है। कुलभूषण पर झूठे आरोप लगाए गए हैं और पाक का बर्ताव काफी निंदनीय है। पाकिस्‍तान में जो जाधव परिवार के साथ हुआ है, वह सिर्फ उनके साथ ही नहीं, बल्कि भारत की 130 करोड़ जनता के साथ हुआ है।

जासूसी का खेल अक्सर भारत और पाकिस्तान द्वारा खेला जाता है। लेकिन गंभीर रूप से असुरक्षित पाकिस्तान अक्सर अपने विचित्र दावों को सही ठहराने के लिए अनुचित तरीकों का सहारा लेता है। उदाहरण के लिए, देखा जा सकता है कि कैसे 1992 में इस्लामाबाद स्थित भारतीय उच्चायोग के राजनीतिक दूत भारतीय राजनयिक राजेश मित्तल के साथ पाकिस्तानियों ने सलूक किया था। उन्हें पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी द्वारा कथित रूप से एक पाकिस्तानी संपर्क से गोपनीय दस्तावेज प्राप्त करते हुए गिरफ्तार किया गया था। आम तौर पर ऐसा करने पर उन्हें भारत वापस भेजा जाना चाहिए था, लेकिन इसके बजाय उन्हें सात घंटे से ज्यादा समय तक हिरासत में रखा गया और जब तक उन्हें भारतीय दूतावास द्वारा बचाया गया, तब तक उन्हें इतना पीटा गया कि वह गंभीर रूप से बीमार हो गए। बाद में वह भारत चले आए और उनकी कहानी अब भुला दी गई है। लेकिन यह पाकिस्तानी रवैये को दर्शाता है।

कुलभूषण जाधव के पास, जो करीब दो वर्षों से पाकिस्तानी जेल में बंद हैं, उत्पीड़न और अनुचित दबावों से बचने का कोई रास्ता नहीं है। निर्मम पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी कैदियों पर कोई भी आरोप थोपने में सक्षम हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे उन्हें बलूची लोगों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को उचित ठहराने में मदद मिलेगी, जो विदेशों और पाकिस्तानी नागरिक समाज की आलोचनाओं के बावजूद दशकों से जारी है।

बलूचिस्तान की समस्या को पाकिस्तान ने खुद जन्म दिया है और कमांडर जाधव की कथित भूमिका बेहद गौण है। बलूचिस्तान 1948 में जबरन और धोखे से पाकिस्तानी संघ में शामिल हुआ। बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे गरीब प्रांत है, हालांकि प्राकृतिक गैस और खनिजों के मामले में वह बेहद समृद्ध है, जिसका पाकिस्तान दोहन करता है। इतनी बड़ी संख्या में बलूची लोगों की हत्या की गई है कि पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने भी उन पर किए गए अत्याचारों की गंभीरता पर सवाल उठाए हैं। ये वे बुनियादी तत्व हैं, जिनके कारण बलूची लोग दशकों से बगावत कर रहे हैं।

इसके अलावा अपनी तमाम खामियों के लिए भारत पर दोष मढ़ने की कोशिश करना पाकिस्तान के लिए सामान्य बात है। सत्तर वर्षीय पुराने विद्रोह के लिए पैंतालीस वर्षीय पूर्व नौसैनिक अधिकारी पर आरोप लगाना सीधे-सीधे तर्कों का अनादर करना है। जाधव द्वारा जासूसी नेटवर्क का संचालन अविश्वसनीय लगता है, क्योंकि तकनीकी रूप से योग्य नौसैनिक अधिकारी द्वारा ऐसा करना असंभव है, क्योंकि जासूसी नेटवर्क का संचालन ज्यादातर पैदल सेना के अधिकारी करते हैं। लेकिन जाधव मामले में पाकिस्तान का अपने दावों से पीछे हटने की संभावना नहीं है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल है कि नई दिल्ली बलूची विद्रोहियों के समर्थन में पहल क्यों नहीं शुरू करती, जिससे पाकिस्तान पर दबाव पड़े, जैसे कि पाकिस्तान तीन दशकों से कश्मीर मामले में दखल दे रहा है। यदि हम तिब्बती मुद्दे के समर्थन में ताकतवर चीन का सामना कर सकते हैं, तो फिर पाकिस्तान के साथ ऐसा करने में क्यों डर रहे हैं।

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