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पुलिस की वर्दी में

Avdhesh Kumarअवधेश कुमार Updated Thu, 16 Jan 2020 07:25 AM IST
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उत्तर प्रदेश पुलिस में कमिश्नर प्रणाली
उत्तर प्रदेश पुलिस में कमिश्नर प्रणाली - फोटो : Shutterstock
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जम्मू-कश्मीर पुलिस द्वारा अपने ही एक डीएसपी को आतंकवादियों के साथ गिरफ्तार करना सनसनी पैदा करने वाली घटना है। एक पुलिस अधिकारी, जिसकी जिम्मेदारी वहां आतंकवादियों से संघर्ष करने की है,  अपने पद पर रहते हुए अगर उन्हीं की मदद करने लगे या उनका साथी बन जाए, तो फिर क्या स्थिति पैदा हो सकती है, इसकी कल्पना से ही सिहरन पैदा हो जाती है। देविंदर सिंह हवाई अड्डे की सुरक्षा में तैनात था, और जो विदेशी राजनयिक जम्मू-कश्मीर की स्थिति का जायजा लेने पिछले दिनों वहां गए, उन सबके साथ वह हवाई अड्डे पर दिखा था।
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कुलगाम के मीर बाजार में जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग पर एक संदिग्ध वाहन को पकड़ा गया था। डीएसपी उसी में थे। कार में से दो एके-47 राइफलें भी बरामद हुईं। श्रीनगर में डीएसपी के आवास की तलाशी के दौरान भी एक एके 47 राइफल और एक पिस्तौल बरामद हुई। जो तीन लोग गाड़ी में सवार थे, उनमें एक आतंकवादी सैयद नवीद मुश्ताक उर्फ नवीद बाबू था। दूसरा आसिफ राथर तथा तीसरा इरफान अहमद मीर था, जो गाड़ी चला रहा था। नावेद पुलिस से भागा आतंकवादी था, जो हिज्बुल मुजाहिदीन में शामिल हो गया था। उस पर 20 लाख रुपये का इनाम है। जबकि इरफान मीर पांच बार पाकिस्तान जा चुका है। जाहिर है, इस तरह के आतंकवादियों के साथ अगर एक डीएसपी गाड़ी में जा रहा था, और उसमें हथियार थे, तो वह शांति स्थापना की यात्रा तो नहीं हो सकती थी। देविंदर सिंह के बारे में यह भी खबर है कि उसने अफजल गुरु को संसद पर हमला करने वाले आतंकियों को दिल्ली ले जाने और उनके लिए फ्लैट और कार की व्यवस्था करने के लिए कहा था। इस मामले की भी जांच होनी चाहिए। मामला चूंकि आतंकवाद का है, इसलिए एनआईए के हाथ में आ गया है। पूरा सच तो जांच के बाद ही सामने आएगा, पर अभी तक पूछताछ में जितनी जानकारी मिली है, उसके अनुसार, डीएसपी श्रीनगर स्थित अपने आवास में आतंकवादियों को शरण देता था तथा उनकी योजनाओं को अंजाम देने में भी सहयोग करता था। आतंकवादी उसके घर में हथियार रखते थे, जिसके लिए वह पैसे लेता था। जम्मू-कश्मीर पुलिस पर यद्यपि पहले भी आरोप लगते रहे,  पर इस तरह से कभी कोई बड़ा अधिकारी आतंकवादी के साथ पकड़ा नहीं गया।

हालांकि ऑपरेशन ऑल आउट की शुरुआत के बाद जम्मू-कश्मीर पुलिस सेना और केंद्रीय पुलिस बल के साथ कदम से कदम मिलाकर काम कर रही थी। आज घाटी में लगभग शांति है, तो उसमें भी जम्मू-कश्मीर पुलिस की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। बावजूद इसके व्यापक स्तर पर जांच तो होनी ही चाहिए, ताकि पुलिस की वर्दी में ऐसे और भी छिपे भेड़िये हों, तो उनकी शिनाख्त और उनके खिलाफ कार्रवाई हो। आज तक अगर जम्मू कश्मीर पुलिस तथा वहां सक्रिय हर प्रकार की खुफिया एजेंसियां देविंदर सिंह के चेहरे के पीछे छिपे एक आतंकवादी को पहचानने में विफल रहीं, तो यह सुरक्षा व्यवस्था की विफलता है। वह राष्ट्रपति पदक से सम्मानित नहीं था, हां, स्थानीय स्तर पर आतंकवाद के खिलाफ उसकी भूमिका को देखते हुए स्वतंत्रता दिवस पर अवश्य मेडल मिला था। यानी वह एक साथ दो तरह की भूमिका निभा रहा था। पुलिस के अंदर सम्मान बनाए रखने के लिए वह संघर्ष भी कर लेता था और आतंकवादियों की मदद भी कर रहा था।

देविंदर सिंह अकेले ऐसा कर रहा था या दूसरे पुलिस वाले भी या पुलिस के बाहर अन्य लोग भी इसमें शामिल थे? हो सकता है, कुछ अन्य भी उसके साथ हों। एक बड़ा तंत्र हो सकता है। गहराई से जांच के बाद ही इससे जुड़े सारे पहलू सामने आएंगे।
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