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अपनों से लड़ती कांग्रेस आप से कैसे लड़ती

रशीद किदवई, वरिष्ठ पत्रकार Updated Wed, 12 Feb 2020 07:17 PM IST
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रशीद किदवई, वरिष्ठ पत्रकार
रशीद किदवई, वरिष्ठ पत्रकार - फोटो : a
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झारखंड, महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनावों के जनादेश से जहां कांग्रेस की कहानी को आधार मिला था, वहीं दिल्ली के नतीजे से देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी को तगड़ा झटका लगा है। ऐसे समय जब कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी की सेहत ठीक नहीं है और वह मार्च के अंत तक उनके उत्तराधिकारी की तलाश करने के लिए कह चुकी हैं, कांग्रेस अंधेरे में भटकती दिख रही है।
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राहुल गांधी से उम्र में महज दो वर्ष बड़े अरविंद केजरीवाल ने कांग्रेस और गांधी परिवार के लिए कड़ी चुनौती पेश की है। तुलना उचित नहीं है, लेकिन अभी प्रासांगिक है। राहुल (19, जून, 1970) और केजरीवाल (16 अगस्त, 1968) के बीच सिर्फ उम्र का मामला नहीं है, बल्कि आम आदमी पार्टी के नेता की शहरी अपील और नरेंद्र मोदी तथा अमित शाह की जोड़ी को लगातार दो बार परास्त करने की उनकी क्षमता भी एक बड़ा कारक है। पिछले एक पखवाड़े के दौरान कांग्रेस के अनेक नेताओं और उनके समर्थकों को सीएए के विरोध और समर्थन के विवाद से बच निकलने की केजरीवाल की क्षमता और अमीर, गरीब, महिला तथा युवाओं को समान रूप से रिझाने के उनके कौशल के बारे में बात करते सुना गया।

2013, 2015 और 2020 की दिल्ली की सफलता ने देश की राजधानी के बाहर भी हर ऐसे क्षेत्र में केजरीवाल को ऐसे दिग्गज के रूप में देखा जा रहा है, जहां कांग्रेस और गांधी परिवार का कुछ आधार और प्रभाव है। हालांकि उनके राष्ट्रीय नेता के रूप में उभरने का रास्ता चुनौतियों और उलझनों से भरा हुआ है। वैसे दिल्ली से बाहर जाने की दिल्ली के मुख्यमंत्री की महत्वाकांक्षा किसी से छिपी नहीं है। 2014 में वाराणसी में नरेंद्र मोदी के खिलाफ लोकसभा का चुनाव लड़ना और 2017 में आप का पंजाब का विधानसभा का चुनाव लड़ना इसके सबूत हैं। मगर सार्वजनिक जीवन में कई वर्ष बिताने का केजरीवाल पर संयत प्रभाव पड़ा है। इत्तफाक से पंजाब आप और केजरीवाल के रडार से दूर नहीं है, क्योंकि अगले विधानसभा चुनाव के समय मौजूदा मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह 80 वर्ष के हो रहे होंगे।
राष्ट्रीय राजनीति के परिप्रेक्ष्य में देखें, तो एनडीए में शामिल प्रत्येक राजनीतिक दल परोक्ष रूप से नरेंद्र मोदी के विकल्प के बारे में सोचता है। दूसरी ओर तृणमूल, बीजू जनता दल, द्रमुक, वाम दल, बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी, तेलुगु देशम और अन्य दल मोदी सरकार को चुनौती देने में राहुल की अक्षमता से मायूस हैं। जबकि जम्मू-कश्मीर के हालात, राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा, अर्थव्यवस्था की सुस्ती सहित अनेक मुद्दे हैं। दशकों से गैरकांग्रेसवाद ने जड़ें जमाई हुई है, जब सबसे पुरानी पार्टी सत्ता में हुआ करती थी। कांग्रेस आज नेतृत्व तो करना चाहती है, लेकिन उसकी यह इच्छा जमीनी सच्चाई के उलट है।

अब तक तो क्षेत्रीय दलों के पास उनकी अपनी समस्याएं होती थीं। कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी के न होने से वे मोदी सरकार की विदेश नीति और रक्षा तथा आर्थिक मुद्दों को चुनौती देने की स्थिति में नहीं हैं। ऐसे में दिल्ली केंद्रित एक नेता भविष्य के लिहाज से अच्छा दांव हो सकता है। यह भी छिपा नहीं है कि उद्धव ठाकरे, एम के स्टालिन और नवीन पटनायक इत्यादि अपनी क्षेत्रीय भूमिकाओं से खुश हैं। ऐसे में 1996-98 के दौरान जिस तरह से क्षेत्रीय क्षत्रपों ने एच डी देवेगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल को प्रधानमंत्री बनाने से गुरेज नहीं किया था, 2024 में ऐसे विकल्प की ओर देखा जा सकता है।
पारंपरिक ज्ञान तो यही कहता है कि राहुल गांधी सोनिया गांधी के स्वाभाविक उत्तराधिकारी हैं। लेकिन विरोध दोनों ओर से है। राहुल संगठन को चलाने में पूरी आजादी चाहते हैं, लेकिन सोनिया चाहती हैं कि वह पार्टी को पदानुक्रम के मौजूदा ढांचे और अहम पदाधिकारियों के साथ मौजूदा स्वरूप में ही स्वीकार करें। कांग्रेस में राहुल के सामने कोई चुनौती नहीं है, लेकिन चुनावी सफलता न मिलने से पार्टी उनसे उम्मीद कर रही है कि वह यथास्थिति बनाए रखें। इस विवेकसम्मत और अनौपचारिक टकराव ने संगठन के भीतर तार्किक परिवर्तन को रोके रखा है।

दिल्ली चुनाव इसी टकराव के बीच लड़ा गया। शीला दीक्षित के निधन के छह महीने बाद तक पार्टी उनके उत्तराधिकारी की तलाश नहीं कर सकी। रोजाना कम से कम एक बार बैठक करने वाले राहुल और सोनिया अजय माकन, संदीप दीक्षित, शर्मिष्ठा मुखर्जी, राजेश लिलोथिया, अरविंद सिंह लवली जैसे आधा दर्जन आकांक्षी नेताओं से विकल्प नहीं चुन सके। आखिरकार पुराने दिग्गज सुभाष चोपड़ा को आगे किया गया, वोट नहीं, बल्कि 'संसाधन' जुटाने की उनकी क्षमता के कारण। कांग्रेस की चालीस स्टार प्रचारकों की टीम कभी मैदान में नहीं दिखी। प्रियंका गांधी और कुछ अन्य नेताओं ने जहां सीएए के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया, वहीं दिल्ली कांग्रेस समिति और उम्मीदवारों की राय जानने की कोशिश नहीं की गई। वहीं जमीन पर अधिकांश कांग्रेस उम्मीदवार उग्र राष्ट्रवाद, शाहीन बाग, जामिया और जेएनयू के विरोध प्रदर्शनों के मुद्दों पर आधे-अधूरे मन से लड़ते रहे।

सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह शायद उस दिन को याद कर शोक मना रहे होंगे, जब 2006 में उन्होंने कथित तौर पर अरविंद केजरीवाल को सूचना आयुक्त बनाए जाने से संबंधित एक मसौदे को नकार दिया था। उस समय सूचना का अधिकार अस्तित्व में आया था और उसके इर्द गिर्द काफी गतिविधियां हो रही थीं। उसी दौरान केजरीवाल को सूचना के अधिकार की दिशा में काम करने के लिए उभरते नेतृत्व वर्ग में रेमन मैगसायसाय पुरस्कार से नवाजा गया था। तब शायद किसी ने सोनिया को सलाह दी थी कि अरविंद केजरीवाल का रुख डॉ मनमोहन सिंह और उनके प्रति उदासीन है। आज ऐसा लगता है कि सोनिया ने एक तरह से केजरीवाल का भला ही किया, वरना केंद्रीय सूचना आयोग में रहकर वह असहमति के लंबे नोट लिख लिख कर निंदक बन चुके होते। पार्टी प्रमुख के रूप में नेहरू-गांधी परिवार की उपस्थिति मोदी विरोधी मोर्चा बनाने की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है। कांग्रेस में ऐसे नेताओं की कमी नहीं है, जिन्हें लगता है कि ऐसे किसी भी मोर्चे का नेतृत्व कांग्रेस के पास होना चाहिए।   
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