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बाजारों में यह तूफान कैसा

मधुरेन्द्र सिन्हा Updated Wed, 29 May 2019 06:36 PM IST
मधुरेन्द्र सिन्हा
मधुरेन्द्र सिन्हा - फोटो : a
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शेयर बाजार नित नई छलांग लगा रहे हैं। जिस दिन एग्जिट पोल आए उसके अगले दिन ही बाजार में बीएसई सूचकांक में 1400 अंकों की उछाल आई। और जब 23 मई को अंतिम परिणाम आने लगे तो शेयर बाजार इतिहास बना गया। बीएसई सूचकांक ने 40,000 का आंकड़ा छूकर एक रिकॉर्ड बनाया। उधर पचास शेयरों वाला निफ्टी भी 12,000 के जादुई आंकड़े के पार कर गया। हालांकि दोनों में ही गिरावट आई है, लेकिन यह ऊपर जाने को उतारू है। पिछली बार भी जब नरेंद्र मोदी सत्ता में आए तो शेयर बाजारों में शानदार तेजी आई थी। इसका ही नतीजा है कि पिछले पांच वर्षों में निवेशकों का धन दुगना हुआ। जिन लोगों ने उस समय एक लाख रुपये बाजार में लगाए थे उनके पैसे बढ़कर 1.70 लाख रुपये तक हो गए।
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कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर मोदी सरकार आर्थिक नीतियों पर जमकर काम करती रही, तो वह दिन भी दूर नहीं कि बीएसई सूचकांक 50 हजार तक पहुंच सकता है। शेयर बाजारों की यह खासियत है कि वह मिली-जुली सरकार पसंद नहीं करते। उनके लिए एक पार्टी का शासन अच्छा होता है, क्योंकि आर्थिक नीतियां बदलती नहीं हैं। राजनीतिक स्थायित्व निवेशकों को दीर्घावधि के लिए निवेश करने को प्रोत्साहित करता है। छोटे निवेशकों के लिए भी यह लाभदायक होता है और उन्हें रिटर्न मिलता रहता है। मोदी की जबर्दस्त जीत से निवेशकों में उत्साह पनपा है और अनिश्चितता का माहौल खत्म हो गया है। शेयर बाजार भावनाओं पर चलते हैं और इस समय यह अपने अधिकतम पर हैं। इससे विदेशी निवेशक निश्चित तौर पर आकर्षित होंगे। इस समय हमारी अर्थव्यवस्था को बड़े पैमाने पर निवेश की बहुत जरूरत है और यह न केवल जीडीपी में बढ़ोतरी करेगा, बल्कि रोजगार को भी बढ़ावा देगा। यह मोदी सरकार ही थी, जिसने कारोबारी सुगमता (इज ऑफ डूइंग बिजनेस) में बड़ी छलाग लगाई और भारत को 77वें स्थान पर ला खड़ा कर दिया है। भारत में निवेश करना और आसान अगर हो जाए तो कोई कारण नहीं कि यहां विदेशी निवेश और बड़े पैमाने पर होगा। वैसे भी चीन में अब निवेशक पैसे लगाना नहीं चाहते हैं। वहां अर्थव्यवस्था धीमी हो गई है और निवेशक कतरा रहे हैं।

इस सरकार के सामने इस समय कई बड़ी चुनौतियां भी हैं और उनका निराकरण समय रहते करना होगा नहीं, तो शेयर बाजारों में गिरावट आ सकती है। ऐसे में विपक्ष को एक मौका मिल जाएगा और वह इसे मुद्दा बनाएगा। वित्तीय संस्था आईएल ऐंड एफएस के लगभग ध्वस्त होने से वित्तीय क्षेत्रों में जो हाहाकार मचा है, उससे पूरी तरह से बाहर निकलना भी जरूरी है। यह मामला 91,000 करोड़ रुपये का है और इसकी जद में बड़े-बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट हैं, जो लटक जाएंगे। इसके अलावा वित्तीय संस्थाओं को भी धक्का लगेगा। इसका असर अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र पर पड़ सकता है। पिछले दिनों भारतीय मुद्रा रुपये में भी गिरावट आई थी जो मोदी सरकार के दोबारा मजबूती से वापस आने के कारण मजबूत हो गया है। कच्चे तेल की कीमतें घट नहीं रही हैं और ईरान-अमेरिका के बीच लड़ाई के हालात बनने के कारण भारत के सामने आपूर्ति की समस्या हो गई है। उधर अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते तकरार का असर सारी दुनिया पर दिखाई पड़ रहा है। अगर अमेरिका चीन के खिलाफ कड़े व्यापारिक कदम उठाएगा तो भारत पर भी दबाव पड़ेगा और हो सकता है कि उसका असर शेयर बाजारों पर पड़ेगा।

अब बड़ा सवाल है कि क्या इस तेजी से बढ़ते हुए बाजार में निवेश करना उचित होगा? इसका जवाब हां और न दोनों ही होगा, क्योंकि शेयर बाजारों के बारे में कोई भविष्यवाणी उचित नहीं होगी। निवेशकों को यह देखना होगा कि आने वाले समय में सरकार क्या कदम उठाएगी और क्या उसके परिणाम होंगे।                             

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