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जीपीएस से जुड़ती जमीन, आर्थिक विकास लाने के कई विकल्प

Bibek Debroyबिबेक देबरॉय Updated Thu, 14 Nov 2019 08:20 AM IST
बिबेक देबरॉय
बिबेक देबरॉय - फोटो : a
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जहां जमीन का सही ढंग से उपयोग नहीं होता है, अमूमन वहां पूंजी का सही लाभ भी नहीं मिल पाता। जमीन के माध्यम से आर्थिक विकास लाने के कई विकल्प हैं, जिनमें मालिकाना हक भी एक विकल्प है। जहां तक भूमि पर अधिकार की बात है, तो यह अधिकारों का एक पुलिंदा है। ऐसी स्थिति में जब भूमि स्वामित्व के कानून के साथ छेड़छाड़ से विवाद पैदा होने की आशंका हो, तब दूसरे अधिकारों (जैसे किरायेदार) का इस्तेमाल किया जा सकता है। एक परेशानी यह भी है कि कई राज्यों में भूमि-संबंधी सर्वेक्षण (चकबंदी) कई दशक पुराने हैं और वहां जमीनों के पट्टों में भी घालमेल है। इस प्रकार जमीन से जुड़ी समस्याओं के कई पहलू हैं लेकिन देश की विकास दर बढ़ाने के लिए भूमि की उत्पादकता में भी सुधार करना आवश्यक है।
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बीते दौर में जिस तरह से विकास हुआ है, उस वजह से आज शहरी और ग्रामीण भूमि में काफी अंतर है। भूमि सुधार का मुद्दा अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है। ऐसे में डिजिटल इंडिया लैंड रिकॉर्ड आधुनिकीकरण कार्यक्रम भले ही छोटा कदम प्रतीत होता हो, लेकिन भूमि सुधार की दिशा में यह एक सही कदम है। पुराने जमाने में केंद्र की दो अलग-अलग योजनाएं थीं-भूमि अभिलेखों का कंप्यूटरीकरण और राजस्व प्रशासन का सुदृढ़ीकरण तथा भूमि अभिलेखों का नवीनीकरण। असल में इन योजनाओं को एक दूसरे से मिलकर काम करना चाहिए, इसी सोच के साथ 2008 में इन्हें जोड़कर डिजिटल इंडिया लैंड रिकॉर्ड आधुनिकीकरण कार्यक्रम बनाया गया, जिसका मकसद जमीन के रिकॉर्ड को एकीकृत करना, राजस्व और पंजीकरण को जोड़ना तथा ऐसी व्यवस्था स्थापित करना था, जिसमें भूमि के पट्टे से संबंधित गड़बड़ियां दूर की जा सकें। विशेष रूप से, डिजिटल इंडिया लैंड रिकॉर्ड आधुनिकीकरण कार्यक्रम के तीन घटक हैं-भूमि रिकॉर्ड का कंप्यूटरीकरण, सर्वेक्षण/पुनः सर्वेक्षण और पंजीकरण का कंप्यूटरीकरण।

ग्रामीण विकास मंत्रालय के भूमि संसाधन विभाग का डैशबोर्ड देखने से पता चलता है कि डिजिटल  इंडिया लैंड रिकॉर्ड आधुनिकीकरण कार्यक्रम में काफी प्रगति हुई है। कुल 6,55,968 गांवों में से अब तक 5,91,137 गांवों के भूमि रिकॉर्ड का कंप्यूटरीकरण पूरा हो गया है, जो लक्ष्य का 90.12 प्रतिशत है। पूर्वोत्तर के राज्यों को एक अलग श्रेणी में रखा गया है। इन राज्यों के अलावा, ओडिशा और सिक्किम ने सौ प्रतिशत भूमि रिकॉर्ड का कंप्यूटरीकरण कर लिया है, जो एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इस मामले में बिहार का प्रदर्शन कुछ खास नहीं है और जम्मू-कश्मीर भी काफी पिछड़ा हुआ है। जब हम इस तरह के आंकड़ों की विवेचना करें, तो आधार को हमेशा ध्यान में रखना चाहिए। जैसे कि यह कार्य उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य के लिए उतना आसान नहीं है, जितना सिक्किम के लिए है। उत्तर प्रदेश के 1,09,109 गांवों की तुलना में सिक्किम में सिर्फ 417 राजस्व गांव हैं। हम जब भी एक राज्य की तुलना दूसरे राज्य से करें, तब यह जरूर देखें कि सुधार की रफ्तार क्या है। परेशानियों के बावजूद उत्तर प्रदेश ने अपने राजस्व गांवों में से 1,05,008 गांवों के भूमि रिकॉर्ड का कंप्यूटरीकरण कर लिया है, जो 96.24 प्रतिशत है। जबकि उससे सटा बिहार केवल 65.31 प्रतिशत गांवों के भूमि रिकॉर्ड का कंप्यूटरीकरण ही कर पाया है।

हाल ही में राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस, 2019 पुरस्कारों की घोषणा की गई थी। इनमें एक श्रेणी  'डिजिटल ट्रांसफॉरमेशन के लिए उत्कृष्ट री-इंजीनियरिंग प्रक्रिया' भी थी। उत्तर प्रदेश के राजस्व बोर्ड ने भूमि प्रबंधन की व्यापक प्रणाली पर अपने काम के लिए स्वर्ण पुरस्कार जीता। प्रदेश के सभी 7.65 करोड़ राजस्व भूखंडों को 16 अंकों का अलग कोड दिया गया है। इसके अलावा भू-अभिलेख, भूमि मानचित्रों का डिजिटलीकरण, दाखिल-खारिज की ऑनलाइन प्रक्रिया, राजस्व अदालत के मामलों की निगरानी, कृषि संबंधी आंकड़े और एंटी-भू माफिया पोर्टल और इनसे जुड़ी सभी ई-सेवाओं को एकीकृत किया गया है। उत्तर प्रदेश ने अपने राजस्व गांवों के 1.16 लाख डिजिटल मानचित्रों में से 90,000 को ऑनलाइन कर लिया है और डिजिटल रूप से हस्ताक्षरित दस्तावेजों का रिकॉर्ड सेवा केंद्रों पर नि:शुल्क उपलब्ध करवा दिया है। जो लोग मुकदमेबाजी कर प्रक्रिया को लंबा खींचना चाहते हैं और जो राजस्व अधिकारी तंत्र में पारदर्शिता लाए जाने का विरोध करते हैं, उन्हें छोड़कर बाकी जनता को इस प्रणाली का पूरा लाभ मिलना चाहिए। इन 90,000 डिजिटल मानचित्रों में से 58,000 मानचित्रों को वास्तविक दस्तावेजों से भी जोड़ लिया गया है।

इस समय 2,333 राजस्व न्यायालयों में लगभग सात लाख राजस्व मामले लंबित हैं।  ऐसे में मुकदमेबाजी की लंबी प्रक्रिया खत्म करके यदि लोगों को राहत दी जा सकती हो, तो आम जन पर पड़ने वाले उसके प्रभाव की आसानी से कल्पना की जा सकती है, और यह भी आसानी से समझा जा सकता है कि बिहार, गोवा, तमिलनाडु और उत्तराखंड जैसे राज्य उत्तर प्रदेश की सफलता से सीख लेकर अपने यहां इसी प्रक्रिया को क्यों लागू करना चाहते हैं। अगले चरण में, आईआईटी, कानपुर सरकार के साथ मिलकर जीपीएस से लैस सीमा स्तंभ लगवाने में मदद करेगा, ताकि राजस्व गांवों को अलग-अलग चिह्नित किया जा सके। अब तक जीपीएस से लैस 8,50,000 खंभे बनाए जा चुके हैं। इन खंभों के लगने के बाद जमीन से संबंधित धोखाधड़ी के मामलों की आशंका काफी कम रह जाएगी।

उत्तर प्रदेश ने प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) पर भी काफी अच्छा काम किया है। इसके बाद पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा मकान (पहले चरण में) बनाए गए हैं। मार्च, 2019 तक उत्तर प्रदेश में 12.48 लाख घर बनाए गए, जो लक्ष्य का 97 प्रतिशत है। पश्चिम बंगाल ने इसी अवधि के दौरान 13.36 लाख घर और मध्य प्रदेश में 13.31 लाख घर बनाए। लेकिन यहां बात केवल अन्य राज्यों के सापेक्ष सुधार के बारे में नहीं है। उपरोक्त दो उदाहरणों से पता चलता है कि उत्तर प्रदेश सिर्फ बदल ही नहीं रहा, बल्कि तेजी से बदल रहा है।
-प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति (ईएसी) के चेयरमैन।
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