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सरकार, नीति और अफसर

बी के चतुर्वेदी Updated Thu, 11 Jan 2018 08:28 AM IST
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आम तौर पर सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के फैसलों पर लोगों, स्तंभकारों और विधि विशेषज्ञों द्वारा चर्चा की जाती है, क्योंकि ये कानूनी व्याख्याएं और संसद व राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित कानून देश के कानूनी ढांचे को समझने के लिए नागरिकों के लिए आधार का काम करते हैं। यह इसलिए अभूतपूर्व है कि सीबीआई कोर्ट के फैसले, जिसमें पूर्व दूरसंचार मंत्री समेत सभी अभियुक्तों को बरी किया गया है, पर काफी टिप्पणियां हुई हैं और इसने मीडिया का ध्यान खींचा है। पिछले करीब एक दशक में इस मुद्दे को लेकर मीडिया में इतनी चर्चा हुई कि हर कोई मानता था कि यह एक बड़ा घोटाला है। पर कोर्ट का फैसला बिल्कुल इसके विपरीत आया। आने वाले महीनों में जब उच्चतर अदालत में अपील की जाएगी, तो एक बार फिर यह मुद्दा उछलेगा। कई समूहों को 'घोटाला न होने' के फैसले पर आपत्ति है। हालांकि यह मामला अभी ठंडा पड़ गया है, लेकिन हमें इसके प्रभावों और लोकतंत्र की संस्थाओं के कामकाज के तरीके पर ध्यान देने की जरूरत है।
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2007 में ट्राई ने देश में मोबाइल फोन के विस्तार के लिए एक रिपोर्ट सौंपी थी। इसके फलस्वरूप देश में जहां एक फीसदी से भी कम लोगों तक टेलीफोन की पहुंच थी, वह 2007 में बढ़कर 18 फीसदी हो गई। दूरसंचार मंत्रालय ने प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए सेवा प्रदाताओं की संख्या बढ़ाने का फैसला किया। मंत्रालय ने लाइसेंस आवंटन की तत्कालीन नीति जारी रखने का फैसला किया, जो कई आवेदकों के लिए अनुकूल थीं। इसके आधार पर 120 लाइसेंस जारी किए गए। 2008 में लाइसेंस जारी किए जाने के बाद इसमें कथित घोटाले की खबरें आने लगीं और सीबीआई ने 2009 में एक मामला दर्ज किया।

वर्ष 2010 में कैग ने एक रिपोर्ट सौंपी, जिसमें राष्ट्रीय खजाने को 1.76 लाख करोड़ रुपये के नुकसान का अनुमान जताया गया, जिसमें जमीनी स्तर पर न्यूनतम 57,666 करोड़ रुपये के नुकसान की बात कही गई, क्योंकि 2008 के बाजार मूल्य के आधार पर प्रवेश शुल्क को संशोधित नहीं किया गया था। इसने घोटाले से संबंधित अंदेशे को हवा दी। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने 2008 में जारी लाइसेंसों को रद्द कर दिया। सीबीआई ने दूरसंचार मंत्री और अन्य लोगों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया, जिसमें सरकार को नुकसान और भ्रष्टाचार का आरोप लगाया गया। आरोपों के आधार पर दूरसंचार मंत्री और दूरसंचार सचिव को गिरफ्तार किया गया। अब सीबीआई कोर्ट ने कहा है कि आरोपों को साबित नहीं किया गया और उसने पाया कि कोई घोटाला नहीं हुआ है। इस फैसले ने कैग, सीबीआई और ईडी के कामकाज पर कई मुद्दे उठाए हैं।

कैग हमारे देश की बेहद सम्मानित संस्था है। इसलिए जब यह कोई मुद्दा उठाती है, तो लोग उसे मान लेते हैं। अदालतों और मीडिया में इसके निष्कर्षों पर बहुत कम सवाल उठे हैं, क्योंकि इसकी विश्वसनीयता बहुत ज्यादा है। मगर कोर्ट ने इस बात को खारिज कर दिया कि सरकार को कोई नुकसान हुआ है। कैग की रिपोर्ट में कई खामियां और अनुत्तरित सवाल हैं।

पहला, नीतियां बनाना सरकार का विशेषाधिकार है। इसलिए जब उसने नए लाइसेंसों के लिए स्पेक्ट्रम शुल्क या प्रवेश शुल्क नहीं बढ़ाने का फैसला लिया, तो वह उसके अधिकार क्षेत्र में था। इसके अलावा ट्राई ने भी एक रिपोर्ट सौंपी थी, जिसमें उसने इन शुल्कों को बढ़ाने की सिफारिश नहीं की थी। कैग ने तर्क दिया कि चूंकि इन शुल्कों का निर्धारण 2001 में किया गया, इसलिए इन्हें संशोधित किया जाना चाहिए और इस आधार पर नुकसान की गणना करनी चाहिए। नुकसान की गणना सरकार की नीतियों के आधार पर होती है, इस आधार पर नहीं कि क्या होना चाहिए।

दूसरा, अनुमानित नुकसान और उसके आधार पर लागत लाभ की गणना करते समय लेखा परीक्षकों को व्यापक आर्थिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए था। मंत्रिमंडल द्वारा अनुमोदित अपनी राष्ट्रीय दूरसंचार नीति में सरकार का दृष्टिकोण विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में टेलीफोन पहुंच का विस्तार करना था, जहां टेलीफोन घनत्व मात्र छह फीसदी था। ग्रामीण क्षेत्रों के 94 फीसदी लोगों के पास 2007 में मोबाइल फोन नहीं था। स्पेक्ट्रम की कीमत और प्रवेश शुल्क बढ़ाने पर सेवा की लागत बढ़ जाती। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में मोबाइल के विस्तार दर में कमी आती, जो राष्ट्रीय दूरसंचार नीति के अनुरूप नहीं होता। तीसरा, अगर कैग के तर्क के अनुसार दर में वृद्धि की जाती, तो बाजार का बहुत धीरे-धीरे विस्तार होता, क्योंकि उपयोगकर्ताओ से उच्च शुल्क वसूला जाता। इससे लाइसेंसधारकों से अर्जित सकल राजस्व वर्तमान की तुलना में धीमी गति से बढ़ता। उच्च लागत के कारण लाभ कम होता है, जिससे करों का सरकारी हिस्सा घट जाता। चौथा, ट्राई ने जमीनी स्तर पर नए लाइसेंसों के लिए शुल्कों में वृद्धि के खिलाफ तर्क दिया था कि प्रतिस्पर्धा के लिए एक समान मैदान की जरूरत होती है। चूंकि वर्तमान लाइसेंस धारक पुरानी दरों का आनंद उठा रहे थे, इसलिए कोई उचित प्रतिस्पर्धा संभव नहीं थी। 
सीबीआई कोर्ट का यह फैसला सभी संस्थानों के लिए आत्मनिरीक्षण का अवसर है कि इस मामले के निष्पादन में उनसे कहां गलती हुई। मीडिया को भी सोचना चाहिए कि मामले को सनसनीखेज बनाने की होड़ में वह कहां गिर गया। जांच एजेंसियों को अपनी नीतियों की समीक्षा करनी चाहिए। 2जी मामले में अनुमानित सरकारी नीति के आधार पर उन्होंने आपराधिक इरादे से नुकसान की गणना की, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया। भ्रष्टाचार का बुनियादी मापदंड यह होना चाहिए कि क्या किसी सरकारी कर्मचारी ने किसी खास तरीके से फैसले लेकर पैसा कमाया है या लाभ लिया है। उन्हें वास्तविक प्रशासनिक फैसलों का अपराधी नहीं बनाना चाहिए, भले वह कुछ सरकारी नीति के अनुरूप न हो। हमारा लोकतंत्र तभी परिपक्व होगा, जब संस्थाएं इस फैसले को अपनी नीतियों की समीक्षा का अवसर बनाएंगी और एक ज्यादा संतुलित दृष्टिकोण के साथ सामने आएंगी।

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