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काले धन के मायाजाल में फंसती सरकार

तवलीन सिंह Updated Sun, 02 Nov 2014 07:45 PM IST
Government caught in jugglery of black money
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क्या काले धन को लेकर मोदी सरकार मायाजाल में फंस गई है? क्या लोकसभा चुनाव के दौरान नरेंद्र मोदी कुछ बातें ऐसी कह गए, जिनका खामियाजा अब भुगत रहे हैं? ये सवाल इन दिनों कांग्रेस के पूर्व मंत्री मुस्कराकर पूछते हैं। वह यह भी पूछते हैं कि क्या हुआ नरेंद्र मोदी के उस वायदे का कि उनकी सरकार बनने के सौ दिन बाद विदेशी खातों में जमा भारतीय पैसा वापस लाकर गरीबों में बांटा जाएगा? उद्योग जगत में जब काले धन की बातें होती हैं, तो उद्योगपति कहते हैं कि ऐसी बातों को छोड़कर सरकार को उन रुकावटों पर ध्यान देना चाहिए, जिस कारण देश में निवेश करना इतना मुश्किल है कि 'मेक इन इंडिया' कठिन है।
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काले धन का यथार्थ यह है कि इसका नब्बे फीसदी से ज्यादा हिस्सा भारत में ही है। कुछ थोड़ा-बहुत जो बाहर है, वह स्विट्जरलैंड के बैंकों में कम और उद्योगों और शेयर बाजारों में निवेश किया हुआ ज्यादा पाया जाएगा। उसको भारत में वापस लाना नामुमकिन है, और अगर किसी न किसी तरह इसे वापस लाया भी जाता है, तो इस देश की अर्थव्यवस्था को कोई फर्क नहीं पड़ेगा। गरीबी हटाने के लिए सही आर्थिक नीतियों की जरूरत है, काले धन की नहीं।

एक जमाना था, कोई तीस-चालीस साल पहले, जब कई भारतीय धनवानों ने अपना पैसा स्विस बैंक खातों में जमा कराया था। उस समय देश की अर्थव्यवस्था ऐसी थी कि धन पैदा करना पाप माना जाता था। कारखानों पर पाबंदियां इतनी अजीब थीं कि उन कंपनियों पर जुर्माने लगते थे, जो कोटे से ज्यादा वस्तु तैयार करते थे।

कई उद्योगपतियों पर टैक्स का शिकंजा ऐसा कसा गया कि 97 प्रतिशत टैक्स अदा करने के लिए उन्हें कर्ज लेना पड़ता था। उदारीकरण का दौर जब शुरू हुआ, तो स्विस बैंकों में पैसा छिपाने की जरूरत नहीं थी। अब न तो राजनेताओं को चुनाव के समय काले धन को विदेशों से वापस लाने के लिए कष्ट करना पड़ता है, और न ही उद्योगपतियों को विदेशी बैंकों में पैसा छिपाने की जरूरत पड़ती है। सो ज्यादातर काला धन यहीं है देश में। काले धन से खरीदे जाते हैं गहने, जमीनें और जायदाद। इससे भी ज्यादा इसका इस्तेमाल होता है चुनावों में। इन बातों की जानकारी देश के हर राजनेता को है। नहीं है, तो सिर्फ बाबा रामदेव को। सो आज भी वह बहकी-बहकी बातें कर रहे हैं।

काले धन के मुद्दे ने तूल पकड़ा है, इसलिए अब सुप्रीम कोर्ट ने इसे खोजने के लिए एक समिति बिठाई है। सरकार अगर विदेशी सरकारों से मिले नाम सार्वजनिक कर देती है, तो उन देशों के साथ भारत के किए गए समझौतों का उल्लंघन हो जाएगा।

मेरा कहने का मतलब यही है कि काले धन का मायाजाल ऐसा है कि उसमें मोदी सरकार ऐसी फंसती जा रही है कि निकलना कठिन हो गया है। ऊपर से समस्या यह है कि उसका ध्यान उन आर्थिक सुधारों से भी हट गया है, जिन्हें किए बिना अर्थव्यवस्था का फिर से आठ फीसदी वृद्धि दर पर दौड़ना संभव नहीं है। आर्थिक विकास दर में तेजी नहीं आएगी, तो कहां से पैदा होगी वे एक करोड़ बीस लाख नई नौकरियां, जिन्हें पाने के लिए हर साल हमारे नौजवान निकलते हैं? रोजगार के अवसर अर्थव्यवस्था मजबूत होने से पैदा होंगे, काला धन लाने से नहीं।
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