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बेहतर भविष्य की बुनियाद

patralekha chatterjeeपत्रलेखा चटर्जी Updated Wed, 22 Jan 2020 06:06 AM IST
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आंगनवाड़ी
आंगनवाड़ी - फोटो : a
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ऐसे वक्त में जब देश में नागरिकता को लेकर भव्य आख्यानों की ध्रुवीकरण की लड़ाई चल रही है, तो भारतीय नागरिकों के प्रारंभिक वर्षों पर नजर डालना भी उपयोगी हो सकता है। बेहतर भविष्य की बुनियाद बनाने के लिए क्या हो रहा है?
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गुणवत्तापूर्ण प्री- प्राइमरी शिक्षा एक बच्चे की यात्रा की नींव है-बाद की शिक्षा का प्रत्येक चरण उसकी सफलता पर निर्भर करता है। किसी भी देश की सफलता उन मूलभूत कौशल पर टिकी होती है, जो बच्चे अपने शुरुआती वर्षों में हासिल करते हैं। जो बच्चे मूलभूत कौशल हासिल नहीं कर पाते हैं, उनके स्कूल और जीवन में पिछड़ने का खतरा होता है, जैसा कि 2019 की शिक्षा की स्थिति से संबंधित वार्षिक रिपोर्ट (ग्रामीण) यानी 'असर 2019' हमें बताती है। यह रिपोर्ट चार से आठ वर्ष की उम्र के बच्चों के शुरुआती वर्षों पर केंद्रित है।

यह रिपोर्ट कई पारंपरिक मान्यताओं को तोड़ती है और हमें बुनियादी मान्यताओं पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करती है। क्या खेल आधारित गतिविधियां, जो स्मृति, तर्क और समस्याओं को सुलझाने की क्षमता का निर्माण करती हैं, शुरुआती वर्षों में पाठ सामग्री आधारित ज्ञान की तुलना में कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है? क्या होगा यदि 'सफलता' इस बात पर निर्भर नहीं करती कि बच्चा कितनी जल्दी औपचारिक स्कूल प्रणाली का हिस्सा बन जाता है, बल्कि इस बात पर कि अपने शुरुआती साल या विद्यालय जाने से पहले वह मूलभूत कौशल हासिल करने में खर्च करता है, जो स्कूल और जीवन दोनों के लिए जरूरी है? ये न केवल हमारे सबसे कम उम्र के बच्चों, बल्कि देश के भविष्य के लिए भी महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।

गैर-लाभकारी संस्था प्रथम द्वारा तैयार कराई गई असर की ताजा रिपोर्ट 24 राज्यों के 26 जिलों में किए गए सर्वेक्षण पर आधारित है। इसमें 1,514 गांवों, 30,425 परिवारों और 36,930 बच्चों को शामिल किया गया है। यह रिपोर्ट देश में शिक्षण के संकट की जड़ों से संबंधित चौंकाने वाली अंतर्दृष्टि प्रदान करती है।

बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा अधिनियम, 2009 कहता है कि उन्हें छह वर्ष की उम्र में पहली कक्षा में प्रवेश देना चाहिए। तीन से छह वर्ष की उम्र के बच्चों के लिए इसमें प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा का प्रावधान किया गया है। लेकिन कई राज्य और केंद्र शासित प्रदेश बच्चों को छह वर्ष से पहले ही पहली कक्षा में दाखिले की अनुमति देते हैं और लाखों बच्चों को अपने शुरुआती वर्षों में सही तरह का बुनियादी कौशल नहीं मिल पाता है।

पिछले वर्ष जून में जारी राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मसौदा बताता है कि इस समय प्रारंभिक स्कूलों में बहुत से बच्चों के पास बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मक कौशल नहीं है। करीब पांच करोड़ बच्चे इस मामले में पीछे हैं। एक बार जब बच्चे पिछड़ जाते हैं, तो उनमें से अधिकांश आगे नहीं बढ़ पाते। कम उम्र में औपचारिक स्कूली शिक्षा में जाने से बच्चों को भारी नुकसान होता है। उसी कक्षा में बड़े बच्चे अपने छोटे दोस्तों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन करने में सक्षम होते हैं।

चुने गए बच्चों का आकलन विकास के चार पैमानों पर किया गया-संज्ञानात्मक ज्ञान; विचारों और भावनाओं को प्रकट करने तथा दूसरों से जुड़ने के लिए प्रारंभिक भाषा कौशल; शुरुआती संख्यात्मकता, जिसमें साधारण संख्यात्मक समस्याएं और रोजमर्रा के जीवन में इन अवधारणाओं को लागू करने की क्षमता शामिल है; और सबसे महत्वपूर्ण, सामाजिक और भावनात्मक विकास, जो बच्चों को विवादों को हल करने और दूसरों के साथ सहानुभूति जताने के लिए भावनाओं को पहचानने और उन्हें विनियमित करने में सक्षम बनाता है।

यह रिपोर्ट एक मिली-जुली तस्वीर पेश करती है। एक ही उम्र के छोटे बच्चे अपने नामांकन के संदर्भ में बिल्कुल अलग होते हैं। यह इस बात को प्रभावित करता है कि वे क्या करते हैं और कैसे अपना समय बिताते हैं। इस सर्वे में शामिल चार से आठ आयु वर्ग के 90 फीसदी बच्चे कई तरह के शिक्षण संस्थाओं में नामांकित हैं, जिसमें आंगनवाड़ी से लेकर सरकारी या निजी प्री-प्राइमरी स्कूल और सरकारी या निजी स्कूल शामिल हैं। लेकिन उनमें मानकीकरण नहीं था। कुछ बच्चों को शिक्षा का अवसर नहीं मिल रहा है। मसलन, वाराणसी में चार साल के 26.4 फीसदी बच्चों का कहीं नामांकन नहीं हुआ है। इसी तरह दीमापुर के चार साल के 18.4 फीसदी बच्चों का नामांकन कहीं नहीं है। पांच वर्ष के 70 फीसदी बच्चे आंगनवाड़ी या प्री-प्राइमरी क्लासों में हैं, जबकि 21.6 फीसदी बच्चे पहले से ही पहली कक्षा में नामांकित हैं। छह वर्ष के 32.8 फीसदी बच्चे आंगनवाड़ी या प्री-प्राइमरी क्लासों में हैं, जबकि 46.4 फीसदी बच्चे पहली कक्षा में और 18.7 फीसदी बच्चे दूसरी या ऊपर की कक्षाओं में हैं।

रिपोर्ट बताती है कि चार से आठ आयु वर्ग में भी लड़के और लड़कियों के नामांकन का पैटर्न अलग-अलग है। ज्यादातर लड़कियों का नामांकन सरकारी स्कूलों में और ज्यादातर लड़कों का नामांकन निजी शिक्षण संस्थानों में है। जैसे-जैसे वे बड़े होते हैं, यह अंतर बढ़ता जाता है। बच्चे कहां दाखिला कराते हैं, यह उनकी मांओं के शैक्षणिक स्तर पर भी निर्भर करता है।

यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि बच्चे अपने शुरुआती वर्षों में संज्ञानात्मक कौशल हासिल करें। जो बच्चे पांच साल की उम्र में अनुक्रमिक सोच वाले कार्य करने में सक्षम थे, उनके पास अपने साथियों की तुलना में बेहतर प्रारंभिक भाषा और संख्यात्मक कौशल था और इसका फायदा उन्हें तीन साल बाद भी मिलता रहा।

भारत में 13 लाख आंगनवाड़ी केंद्र हैं, जो छह वर्ष से कम उम्र के बच्चों को पूरक पोषण, टीकाकरण और प्री-स्कूली शिक्षा प्रदान करते हैं। असर, 2019 के निष्कर्ष उन्हें मजबूत बनाने की बात करते हैं, ताकि वे बच्चों को स्कूल जाने के लिए तैयार कर सकें। कम उम्र के बच्चों को स्कूली कक्षा में दाखिला देने से उन्हें केवल नुकसान होता है। शुरुआती वर्षों में औपचारिक विषय सिखाने के बजाय कौशल विस्तार पर ध्यान दिया जाना चाहिए। जैसा कि हम नागरिकता के विषय पर बहस करते हैं, हमें भारतीय नागरिकों के शुरुआती वर्षों पर भी ध्यान देना चाहिए।
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