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बाढ़ और संवेदनहीनता : सच कड़वा है, लेकिन इस कड़वे सच को स्वीकार करना पड़ेगा

तवलीन सिंह Updated Tue, 23 Jul 2019 05:56 AM IST
सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : amar ujala
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असम में बाढ़ का हाल देखकर अभिनेता अक्षय कुमार को इतनी तकलीफ हुई कि उन्होंने मुख्यमंत्री राहत कोष में दो करोड़ रुपये दान करने की घोषणा कर दी। साथ में यह भी कहा कि हम सबको उन लोगों की राहत के लिए कुछ न कुछ दान करना चाहिए, जो इस आपदा के कारण अपना सब कुछ खो चुके हैं। बिहार के डूबते गांवों को देखकर मेरे दिल में ऐसी ही भावना जगी। भूखे बच्चों और उनके लाचार माता-पिता का हाल देखकर दुख हुआ।
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फिर देखा कि बिहार के उप-मुख्यमंत्री सुशील मोदी पटना के किसी पांच सितारा होटल में बैठे रितिक रोशन के साथ मुस्कराकर बातें कर रहे हैं, मेरा दुख क्रोध में बदल गया। हमारे राजनेता कैसे हैं, जिनको इतनी बड़ी आपदा के समय अभिनेताओं से मिलने के लिए फुरसत मिलती है, लेकिन उन लोगों तक राहत पहुंचाने की फुरसत नहीं मिलती, जिन्होंने उनको चुनकर भेजा है उनकी देखभाल करने?

मन में सवाल करते ही जवाब भी मिल गया। ये वैसे लोग हैं, जिनके कारण अपने देश का अब भी इतना बुरा हाल है। आपदाएं हर देश में आती हैं। लेकिन एक बार आने के बाद उन देशों की सरकारें अगली आपदा के लिए तैयार हो जाती हैं। अपने यहां ऐसा बहुत कम होता है। जहां होता है, वहां लोगों को सहायता मिल जाती है, उनकी जानें बच जाती हैं। कभी ओडिशा में चक्रवात के समय हजारों की तादाद में लोग मरते थे। पर अब ऐसा नहीं होता। हाल में वहां फैनी नाम का चक्रवात आया, तो नवीन पटनायक की सरकार ने लाखों लोगों को समुद्रतटीय गांवों से सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने का काम किया।

ओडिशा में गरीबी शायद बिहार से भी ज्यादा है, लेकिन फर्क यह है कि वहां की सरकार में संवेदनशीलता ज्यादा है। कहने का मतलब स्पष्ट कर दूं। हमारे देश में सबसे बड़ी आपदा है सरकारों की संवेदनहीनता। बिहार जैसे राज्यों में यह संवेदनहीनता बार-बार देखने को इसलिए मिलती है, क्योंकि वहां के लोग अपनी गरीबी के कारण इतने बेजुबान हैं कि अपने बच्चों का बेमौत मरना भी भुला देने पर मजबूर हैं।

कुछ दोष हम पत्रकारों का भी है। मुंबई या दिल्ली में अगर सौ लोगों की मौत हुई होती, तो हम हंगामा मचा देते, लेकिन बिहार या असम के दूर-दराज के गांवों में जब गरीब लोग मरते हैं, तो हम थोड़ी देर के लिए ध्यान देते हैं और फिर आंखें मोड़ लेते हैं। मुजफ्फरपुर के उस अस्पताल में बच्चों का बीमार व्यवस्था से मरना आज कौन याद करता है? अब यह देखने कौन जाता है कि उस अस्पताल में सुधार लाए गए हैं कि नहीं। समस्या यह है कि ‘नए’ भारत का निर्माण तब तक नहीं होगा, जब तक आम लोगों के लिए वे आम सेवाएं उपलब्ध नहीं की जाती हैं, जो उनका अधिकार हैं। यह काम सिर्फ सरकारें कर सकती हैं।

अजीब समय है। एक तरफ हम चांद तक पहुंचने के सपने देख रहे हैं। अगले दशक में पचास खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बन जाने के सपने देख रहे हैं। दूसरी तरफ यह शर्मनाक यथार्थ है कि हमारे लोगों को हमारी सरकारें आपदा के समय राहत पहुंचाने का काम तक नहीं कर पाती हैं। वह भी ऐसे दौर में, जब राहत पहुंचाने के आधुनिक जरिये उपलब्ध हैं।

सच कड़वा है, लेकिन इस कड़वे सच को स्वीकार करना पड़ेगा कि देश की सबसे बड़ी समस्या संवेदनहीन शासकों की है। जब तक संवेदनहीनता की इस बीमारी का इलाज हम नहीं ढूंढ पाते, तब तक हर वर्ष ऐसा ही होता रहेगा। हमारे राजनेताओं को शर्म आनी चाहिए कि फिल्मी सितारों में उनसे ज्यादा संवेदनशीलता देखने को मिलने लग गई है।
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