कुछ किताबें और एक कैफे, पढ़ें रामचंद्र गुहा का आलेख

रामचंद्र गुहा Updated Sun, 18 Oct 2020 05:06 AM IST
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जब 1995 में मैं स्थायी तौर पर बंगलूरू आ गया, तो मुझे उम्मीद थी कि मैं यहां खासतौर से पांच संस्थानों के साथ अपनी पहचान को फिर से ताजा करूंगा। इनमें से दो बुक स्टोर्स थे। इनमें से एक 'प्रीमियर' के मालिक कोंकण तट के एक शर्मीले हिंदू थे और वह नई किताबें बेचा करते थे। दूसरे स्टोर 'सलेक्ट' के मालिक थे एक मुखर कन्नडिगा इंजीनियर, और वह इस्तेमाल की हुई या सेकंड हैंड किताबें बेचते थे। दोनों मालिक अपने स्टॉक के बारे में और अपने नियमित ग्राहकों की दीवानगी के बारे में अच्छी-खासी जानकारी रखते थे।
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बंगलूरू के जिन दो अन्य संस्थानों को मैं जानता था, उनका संबंध भी छपे हुए शब्दों से था। इनमें से एक था, वैरायटी न्यूज, जिसके पास पूरे भारत के साथ ही दुनिया भर की पत्रिकाएं होती थीं; इसका स्वामित्व एक मुस्लिम परिवार के पास था, जो आपस में दक्खिनी बोलते थे और अपने ग्राहकों के साथ अंग्रेजी या कन्नड़ या तमिल। प्रीमियर और सलेक्ट के मालिकों की तरह वैरायटी के संचालकों के अपने ग्राहकों के साथ शानदार रिश्ते थे, उन्हें उनकी रुचियों के बारे में पता था और वे पेशेवर तरीके से उनकी सेवा करते थे। इसके अलावा वहां ब्रिटिश लाइब्रेरी भी थी। मुझे ये सभी जगहें पसंद थीं; लेकिन जो जगह मुझे सबसे अधिक प्रिय थी, वह थी कोशी'स परेड कैफे। शहर के नए वाशिंदे इसे कोशी'स के नाम से जानते हैं; लेकिन मेरे लिए यह हमेशा परेड्स ही रहा। यह रेस्तरां सेंट मार्क रोड पर चर्च ऑफ साउथ इंडिया के मालिकाना हक वाली एक दो मंजिला इमारत के भू-तल में स्थित है।
परेड्स की स्थापना 1952 में केरल के एक सीरियाई ईसाई पी ओ कोशी ने की थी। मुझे पहली बार इसके बारे में ठीक पचास साल पहले 1970 में पता चला था। मैं उन दिनों बंगलूरू में अपने चाचा के साथ गर्मियों की छुट्टियां बिता रहा था। उनके साथ मैं रोजाना दोपहर के समय फ्रैंड्स यूनियन क्रिकेट क्लब के मैदान जाता था, जो कि कांतीराव स्टेडियम की उल्टी दिशा में स्थित था और कोशी'स से बस इतनी दूर जहां तक क्रिकेट की गेंद फेंकी जा सके। नेट प्रैक्टिस के बाद हम क्रिकेटर कैफे जाते थे, जहां युवा तो कॉफी पीते थे और मैं (तब मैं 12 वर्ष का था) लाइम जूस पीता था।
1980 के दशक में मुझे परेड्स के बारे में तब अच्छे से जानने का मौका मिला, जब मैं बंगलूरू में काम कर रहा था। हमारा घर एम जी रोड (ट्रिनिटी सर्किल रोड) के पास था और यह कैफे सलेक्ट और प्रीमियर की ओर जाने के रास्ते पर ही पड़ता था। कोशी'स से सड़क पार करते ही वैरायटी न्यूज स्थित था और कोशी'स से ऊपर मंजिल पर ब्रिटिश लाइब्रेरी। लिहाजा परेड्स जाते हुए मुझे प्रिंट संस्कृति के चार विविध भंडारों में जाने का मौका भी मिल जाता था। कैफे में दाखिल होने के बाद अमूमन मैं एक कॉफी और कुछ स्नैक्स वगैरह मंगाता और फिर अपने झोले से थोड़ी देर पहले खरीदी गई किताबें और पत्रिकाएं निकालकर प्यार और प्रत्याशा के साथ उनके पन्ने उलटने लगता। कोशी'स में करीब आधा घंटा बिताने के बाद मैं पैदल चलते हुए घर लौट जाता।

1989 में मैं और मेरी पत्नी दिल्ली आ गए और छह साल बाद ही वापस लौट सके। 1995 में वे सारी जगहें जिन्हें मैं जानता था और जिनसे प्रेम करता था, वैसे ही फल-फूल रही थीं। 2020 में हालात कुछ बदल गए हैं। प्रीमियर, वैरायटी न्यूज और ब्रिटिश लाइब्रेरी बंद हो चुकी हैं, जबकि सलेक्ट अपने अतीत की छाया भर रह गया है। बंगलूरू में मेरे बसने के पच्चीस साल बाद सिर्फ एक संस्थान मेरे साथ साझा करने के लिए बचा है और वह कोशी'स परेड्स कैफे।

परेड्स का संचालन अभी इसके संस्थापक के पोते संतोष और प्रेम कर रहे हैं। संतोष शांत और संकोची हैं और पर्दे के पीछे रहकर सांस्थानिक कामकाज को संचालित करते हैं, जबकि प्रेम मिलनसार हैं, ग्राहकों से गप्पें लड़ाते हैं और मेनू में जुड़ी नई चीज पर उनकी प्रतिक्रिया लेते हैं। 

प्रेम कोशी मेरी पत्नी सुजाता की उम्र के हैं और दोनों ही आसपास की स्ट्रीट में बड़े हुए। उन दिनों वह राइफल शूटिंग के दीवाने थे। बैंकिंग टेक्नोलॉजी की पढ़ाई के लिए वह लुसियाना गए और वहां शराब के नशे में पड़़ गए। वापस लौटने के बाद उन्होंने शूटिंग और शराब, दोनों छोड़ दी। कोशी'स के अनेक आकर्षण हैं, प्रकाश, परिवेश, व्यंजन, स्थान और इसके दो मालिक। प्रेम गठीले हैं, अक्सर जींस पहनते हैं और उनकी कमर में चाबियों का गुच्छा लटकता रहता है। वह ग्राहकों के प्रति बेहद विनम्र होते हैं, वहां पहली बार आने वाला कोई ग्राहक सिर्फ एक कॉफी पीकर वहां घंटों ठहर सकता है। मैंने कभी भी उन्हें आवाज ऊंची करते नहीं देखा और न ही उनके चेहरे पर तनाव देखा, यहां तक कि तब भी जब सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर उन्हें जब इस आधार पर शराब परोसना बंद करना पड़ा कि उनका रेस्तरां एमजी रोड जो कि कथित नेशनल हाई-वे है, से नजदीक है। (यह इस फैसले को उलट दिए जाने के कुछ महीने पहले की बात है, जिससे कोशी'स को भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ा।)

जो लोग एकाधिक बार परेड्स जाते हैं, वे प्रेम को पसंद करने लगते हैं। जो लोग कुछ वर्षों से वहां जा रहे हों उन्हें उनकी पत्नी रूबी, बेटे जोश और थियेटर से उनके प्रेम और इमारतों से सांप पकड़ने और उनका पुनर्वास करने की क्षमता के बारे में भी पता है। वह एल्कहॉलिक अनानमस (शराब का नशा छुड़ाने में मदद करने वाली संस्था) से भी जुड़े हुए हैं।

मैं खुद प्रेम से जुड़ी दो कहानियां जानता हूं। इसमें से पहले का संबंध एक प्रतिभाशाली युवा फोटोग्राफर जी राघव से था, जिसने कैफे आने वाले लोगों के पोट्रेट की शृंखला तैयार की थी, जिनमें महान नाटककार गिरीश कारनाड भी थे। कम उम्र में ही कैंसर से राघव की मौत हो जाने पर प्रेम ने उनके काम को याद करते हुए एक श्रद्धांजलि सभा रखी और पूरे दोपहर रेस्तरां को बंद रखा तथा सिर्फ चाय तथा स्नैक्स परोसे और हम सबने अपने मित्र और उसकी विरासत को याद किया। दिल्ली या मुंबई का कोई रेस्तरां किसी अपेक्षाकृत अनजान कलाकार की स्मृति में घंटों अपना कारोबार बंद नहीं रखेगा।

एक रात सुजाता और मैं जब घर लौटे, तो हमने गैरेज में एक बड़ा-सा उल्लू देखा। वह वहां से हिलने को तैयार नहीं था और हम उसे कोई नुकसान नहीं पहुंचाना चाहते थे। हमें सूझ नहीं रहा था कि क्या करें। सुजाता ने कहा प्रेम को फोन लगाओ। उस समय 10.30 बज रहे थे। सुजाता ने उन्हें फोन लगाने के लिए जोर देते हुए कहा कि वह पक्षियों और जानवरों के बारे में जानते हैं और उन्हें मदद कर सकते हैं। मैंने प्रेम को फोन लगाया। वह आए और उन्होंने देखा कि बड़ा-सा उल्लू हमें तब भी घूर रहा था। उन्होंने उसकी ओर थोड़ी देर देखा और फिर उसे एक हाथ में उठा लिया। इसके बाद प्रेम मुख्य सड़क पर आए और उल्लू को आकाश की ओर उड़ा दिया। हमने जब प्रेम से जानना चाहा कि उन्होंने यह कैसे किया, तो उनका जवाब था कि वह नशे में था, उसने ताड़ के पेड़ की जड़ों को अधिक देर तक चूस रखा होगा, पूर्णिमा की रातों में इस मौसम में इस प्रजाति के पक्षी ऐसा करते हैं।

बंगलूरू के दूसरे कारोबार की तरह कोशी'स परेड्स कैफे भी महामारी से बुरी तरह प्रभावित हुआ है। अप्रैल से यह बंद था और पिछले हफ्ते ही यह कड़ी सुरक्षा के बीच दोबारा शुरू हुआ है। जब लोग बड़े होते जाते हैं, तो उनकी इच्छाएं और खुद के लिए उम्मीदें कम होती जाती हैं। मैं चाहूंगा कि मेरी मौत मेरे पसंदीदा कैफे के बंद होने से पहले आ जाए। मैं संभवतः संगीत, क्रिकेट और यहां तक कि किताबों के बिना भी रह सकता हूं, लेकिन परेड्स के बिना जीवन की कल्पना मुश्किल है।
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