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लोकतंत्र में नेहरू-गांधी परिवार की सामंतवादी आदतों की याद दिलाना जरूरी नहीं

तवलीन सिंह Updated Mon, 13 May 2019 06:33 AM IST
sonia and rahul
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पिछले सप्ताह जब नरेंद्र मोदी ने अपने एक भाषण में कहा कि राजीव गांधी ने नौसेना के आईएनएस विराट का दुरुपयोग किया था, उसी दिन प्रियंका गांधी ने अपने भाषण में कहा कि प्रधानमंत्री अपनी हर गलती का दोष उनके परिवार पर थोपते हैं। सवाल यह है कि क्या देश के मतदाताओं को नेहरू-गांधी परिवार की सामंतवादी आदतों की याद दिलाना जरूरी नहीं है। क्या यह याद दिलाना जरूरी नहीं है कि भारतीय लोकतंत्र में एक ऐसा दौर था, जब प्रधानमंत्री परिवार को छुट्टियां मनाने नौसेना के जहाजों पर लक्षद्वीप लेकर जाया करते थे ?
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मुझे गांधी परिवार की वह छुट्टी याद है। याद है कि उनके साथ कौन-कौन गए थे। यह भी याद है कि हम पत्रकार उन दिनों देश के इस अति-शक्तिशाली राजपरिवार के इतने गुलाम थे कि देश भर में शायद ही कोई पत्रिका थी, जिसने उस छुट्टी की आलोचना करने की हिम्मत दिखाई हो। दोष हम पत्रकारों का तो था ही, लेकिन वह दौर ही कुछ ऐसा था कि बहुत कम लोग थे, जिनको लोकतंत्र में सामंतवाद की इस नकरात्मक मिलावट का ध्यान था।

अच्छा है कि देश की राजनीति अब बदल गई है और प्रधानमंत्री निवास में एक चायवाले का बेटा विराजमान है, जिसने कभी छुट्टी नहीं ली। मोदी ने आईएनएस विराट का जिक्र क्या किया कि सोशल मीडिया पर तस्वीरें दिखने लगीं, जिनमें दिखाया गया है कि किस तरह पंडित नेहरू ने कभी अपनी बेटी और नवासों को भी नौसेना के एक लड़ाकू जहाज पर घुमाया था। मुझे लोगों ने लेख भेजे हैं, जिनमें आईएनएस विराट का पूरा वर्णन दिया गया है और यह भी लिखा गया है कि इस किस्म के लड़ाकू जहाज पर विदेशियों के होने पर प्रतिबंध है। राजीव गांधी के मेहमानों में सोनिया के इतालवी रिश्तेदार भी लक्षद्वीप में छुट्टी मनाने गए थे। मुझे एक और लेख मिला, जिसमें खर्च और पूरे प्रबंध के बारे में विस्तार से बताया गया।

इन दोनों लेखों को पढ़कर मैं हैरान रह गई। लेकिन मेरे अधिकतर पत्रकार बंधुओं में गुलामी की भावना या नरेंद्र मोदी के लिए नफरत अब भी है। बहुत कम लोग हैं, जिन्होंने गांधी परिवार की सामंतवादी आदतों के बारे में लिखा है। उलटे कइयों ने कहा है कि मोदी गांधी परिवार पर कीचड़ सिर्फ इसलिए उछाल रहे हैं, क्योंकि वह अपनी सरकार की गलतियों से ध्यान हटाना चाहते हैं।

चलिए मान लिया जाए कि मोदी अपनी सरकार की खामियां छिपाने के लिए इस तरह के मुद्दे उठा रहे हैं। लेकिन क्या हमें यह स्वीकार नहीं करना चाहिए कि इस तरह के मुद्दे जितने उठते हैं, उतना ही अच्छा है, क्योंकि इससे लोकतंत्र मज़बूत होता है? निजी तौर पर मेरा मानना है कि लोकतंत्र में जब भी सामंतवाद की बू आने लगती है, उस पर फौरन ध्यान आकर्षित करना चाहिए।

मैं ऐसा मानती हूं, क्योंकि मैंने वे दौर देखे हैं, जब लोकतंत्र के नाम पर असली सामंतवाद था। हमारा लोकतंत्र अब भी इतना कमजोर है कि पांच वर्ष पूर्व देश के प्रधानमंत्री सोनिया गांधी के सामने सिर्फ इसलिए झुकते थे, क्योंकि वह उस राजपरिवार की बहू हैं, जिन्होंने 1947 से आज तक देश को अपनी जागीर माना है।

उस राजपरिवार के वारिस इस लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के मुख्य प्रतिद्वंद्वी हैं और इतना अहंकार है राहुल गांधी में कि महीनों से वह कहते आए हैं कि प्रधानमंत्री चोर हैं। मोदी ने जब पलटवार कर उनके पिताजी को भ्रष्टाचारी नंबर एक कहा, तो हल्ला मच गया। क्या हमको पूछना नहीं चाहिए कि ऐसा क्यों होता है?

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