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असम का प्रयोग पूरे देश में, खुद को भारतीय सिद्ध करने की चुनौती

subhasini sehgal aliसुभषिनी सहगल अली Updated Fri, 20 Sep 2019 08:54 AM IST
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असम में एनआरसी (राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर) की अंतिम सूची विगत 31 अगस्त को सार्वजनिक कर दी गई। अब जिन करीब 20 लाख लोगों के नाम इस सूची में नहीं हैं, उनके मामलों की सुनवाई कुछ हफ्तों के बाद ‘ट्रिब्यूनल’ के सामने होगी, जिनकी अध्यक्षता सरकारी कर्मचारी करेंगे, जबकि यह सुनवाई, जो इन लोगों के लिए जीवन और मौत का सवाल है, न्यायिक संस्था के सामने होनी चाहिए।
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बीती सदी के 80  के दशक में असम की संस्कृति को ‘बाहरी’ लोगों के बड़े पैमाने पर हुए आगमन से बचाने को लेकर असम में बड़ा आंदोलन छिड़ गया था, जिसमें हिंदू, मुस्लिम, आदिवासी-यानी असम के तमाम लोगों ने हिस्सा लिया था। 1985  में हुए असम समझौते में तय हुआ कि असम में रहने वाले तमाम लोगों की जांच की जाएगी और 1971 (जब बांग्लादेश का जन्म हुआ था) के बाद आने वाले लोगों को नागरिकता से वंचित कर दिया जाएगा।

आंदोलन के दौरान यह आम प्रचार था कि ‘बांग्लादेशी घुसपैठियों’ की संख्या करोड़ों में है, और भाजपा ने यह कहकर, कि घुसपैठियों का बड़ा हिस्सा मुसलमानों का है, इस मुद्दे को देश भर में अपने राजनीतिक अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया। हाल में, सर्वोच्च न्यायालय ने असम में रहने वाले तमाम लोगों की 31 अगस्त तक गणना करने और गैर नागरिकों को चिह्नित करने का आदेश दिया। खुद को भारत का नागरिक साबित करने के लिए असम में रहने वाले गरीब लोगों को कठिन प्रयास करने पड़े।

31 अगस्त को सार्वजनिक की गई अंतिम सूची चौंकाने वाली थी। 19.5 लाख लोगों के नाम उसमें शामिल नहीं थे, जबकि दावा किया जा रहा था कि करोड़ों लोग घुसपैठिये हैं। इनमें मुसलमानों की संख्या आधे से बहुत कम है। पर 20 लाख भी बहुत होते हैं। इनमें बड़ी संख्या गरीब मजदूरों की है, जो आगे लड़ने का साधन जुटा नहीं पाएंगे। इनमें बड़ी संख्या गरीब महिलाओं की है, जिनका मायका ससुराल से दूर है। उन्हें तमाम दस्तावेज़ प्राप्त करने में विशेष दिक्कत होती है।

और इनमें बहुत सारे बच्चे भी हैं। असम से दिल दहला देने वाली कहानियां आ रही हैं। कुछ महिलाओं ने तो अपना नाम सूची में न होने के डर से आत्महत्या कर ली। नौ साल की कुलसुम का नाम नहीं आया, पर उसकी बहन का आ गया। उसके नाना और मामाओं का नाम आ गया, पर उसकी मां का नहीं। नीला घोष और उसके पति का नाम सूची में है, लेकिन उनकी पांच बच्चियों का नहीं है।

जिनके नाम सूची में नहीं है, वे बहुत डरे हुए हैं। उन्हें पता है कि नागरिकता साबित न होने पर उन्हें बंदीगृहों में भेज दिया जाएगा और वे उनके हालात से परिचित हैं। विदेशी’ घोषित किए हजारों लोगों को वहां भेजा गया है। इनमें भी हर धर्म को मानने वाली बहुत सारी महिलाएं हैं। बंदीगृहों की परिस्थितियां नारकीय हैं। जितनी जगह है, उससे कहीं अधिक लोग उनमें ठूंसे गए हैं। वे मुजरिम नहीं हैं, पर उनको पता ही नहीं चल पा रहा कि उन्हें कब छोड़ा जाएगा, छोड़ा जाएगा भी कि नहीं। गोआलपारा में गरीब मजदूर नया बंदीगृह बना रहे हैं। उन्हें डर है कि जब वह तैयार हो जाएगा, तो उन्हें ही उसमें ठूंस दिया जाएगा।

अब तो सरकार ने तय कर लिया है कि पूरे देश में नागरिकों की गिनती की जाएगी। देश भर के लोग चकरघिन्नी की तरह अपने आपको भारतीय सिद्ध करने के लिए चक्कर काटेंगे और दिवालिया बना दिए जाएंगे। अभी गिनती शुरू नहीं हुई है, लेकिन राज्य सरकारों को बंदीगृह बनाने के लिए जमीन अधिगृहीत करने के आदेश दे दिए गए हैं।

-लेखिका माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्य हैं।  
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