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नई सरकार की परीक्षा, शुरुआती सौ दिन कतई आसान नहीं

बिंदू डालमिया Updated Mon, 13 May 2019 06:30 AM IST
भारतीय अर्थव्यवस्था (प्रतीकात्मक)
भारतीय अर्थव्यवस्था (प्रतीकात्मक)
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इस महीने के अंत तक नई सरकार सत्रहवीं लोकसभा में अपनी जगह बना चुकी होगी। हालांकि यह उत्सुकता भी बढ़ रही है कि भारतीय लोकतंत्र में इस चुनाव के नतीजे क्या रहेंगे। अगर चुनाव से पहले आए छह अनुमानों के औसत की बात करें, तो साफ लग रहा है कि भारतीय जनता पार्टी को फिर सत्ता में लौटना चाहिए। अगर अब तक के चुनावी चरणों की ओर देखें, तो यह भी जाहिर है कि कोई एंटी इनकंबेंसी फैक्टर नहीं है। यही तथ्य इस लोकसभा चुनाव को 2004 के चुनाव से अलग करता है।
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सर्वेक्षणों के अनुसार, एनडीए को करीब 272 सीटें मिलने जा रही हैं। इस तरह नरेंद्र मोदी चुनावी दौड़ में सबसे आगे हैं। कांग्रेस और सहयोगियों के 141 सीटों तक पहुंचने का अनुमान जाहिर किया जा रहा है। सारा गुणा-भाग इस पर आधारित है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा को सपा-बसपा गठबंधन के हाथों कितना नुकसान हो सकता है। फिर विगत दिसंबर में ही हिंदी हृदय प्रदेश के तीन राज्यों-राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में मोदी की लोकप्रियता के बावजूद भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था। यह भी माना जा रहा है कि बिहार, दिल्ली और गुजरात जैसे मजबूत किले में भाजपा पर आंच आ सकती है। पर ममता बनर्जी के गढ़ पश्चिम बंगाल और नवीन पटनायक के ओडिशा में भाजपा की स्थिति बेहतर होने की उम्मीद है।

हालांकि यह बात सही है कि पिछले लोकसभा चुनाव में जिन लोगों ने भाजपा को वोट किया था, उनमें से 31 फीसदी मध्यवर्ग के लोग नोटबंदी से निराश हुए हैं। लेकिन भाजपा ने अपनी रणनीति मुख्य तौर पर चार चीजों पर केंद्रित की है। ये हैं, पहली बार वोट देने वाले मतदाता, अपना काम शुरू करने वाले लोग, वे लोग, जिन्हें सरकार की सामाजिक कल्याण योजनाओं का लाभ मिला, और महिलाएं। हालांकि महिलाओं का वोट एक जगह नहीं पड़ता।

अलबत्ता केंद्र की सत्ता में जो भी सरकार आए, उसके लिए शुरुआती सौ दिन कतई आसान नहीं होंगे। इसकी वजह वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की वह चेतावनी है, जिसके अनुसार, इस साल दुनिया के 70 प्रतिशत देशों में मंदी आने के आसार हैं, जिनमें भारत भी शामिल है। जाहिर है, आनेवाली नई सरकार के लिए यह बड़ी चुनौती होगी, जिसे वैश्विक मंदी के समानांतर विकास की बहाली करनी होगी। गरीबी दूर करने के लिए जरूरी स्रोतों का इस्तेमाल करना सरकार के लिए बड़ी जरूरत होगा। फिर से चुने जाने पर नरेंद्र मोदी सरकार की चुनौतियां क्या होंगी? नई सरकार को बुनियादी क्षेत्र और आवासीय क्षेत्र में विकास को जारी रखना होगा, क्योंकि इन दोनों क्षेत्रों से बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा होंगे। स्वरोजगार के लिए नए उद्योगों के अवसर बढ़ेंगे। इससे औपचारिक क्षेत्र में रोजगार सृजन होगा। नई सरकार को इसके अलावा आयुष्मान भारत जैसे सामाजिक क्षेत्र के कार्यक्रम को आगे बढ़ाना होगा। इसके साथ-साथ किसानों की आय बढ़ाने के लिए वित्तीय प्रावधान करने के साथ मध्यवर्ग को भी करों के बोझ से बचाना होगा। यूनिवर्सल इनकम सपोर्ट स्कीम के लिए जीडीपी के एक प्रतिशत की आवश्यकता अगले कुछ साल तक होगी। इससे ग्रामीण उपभोक्ताओं की जरूरतों को गति मिलेगी। कुल 12 करोड़ किसानों के परिवारों को पीएम किसान योजना से भी लाभ की उम्मीद होगी।

भारत को तेज आर्थिक विकास की आवश्यकता होगी। ऐसा तभी हो पाएगा, जब अर्थव्यवस्था को बढ़ाया जाए और महंगी और लोकप्रिय सामाजिक योजनाओं की जगह इस पर ध्यान दिया जाए, जिससे कि आर्थिक फायदा खुद ब खुद नीचे तक पहुंचे। इसके लिए कई उपायों की जरूरत होगी, जैसे कि  टैक्स आधार बढ़ाने की आवश्यकता है, रोजगार सृजन तथा मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को मौजूदा 17 फीसदी से बढ़ाकर वर्ष 2022 तक 25 फीसदी करना होगा। साथ ही सौ लाख करोड़ रुपये के निवेश से हाइवे, रेलवे और हवाई अड्डों का संजाल बिछाना होगा। इससे 25-30 लाख करोड़ नौकरियां पैदा होंगी। संरचनागत और बाजार आधारित सुधार तेज करने होंगे। व्यापार उदारीकरण तथा भूमि रिकॉर्ड्स का डिजिटलीकरण करना होगा। एयर इंडिया और एमटीएनएल के निजीकरण की प्रक्रिया शुरू करनी होगी। कुल 34 ऊर्जा संयंत्रों के 1.80 लाख करोड़ के घाटे को कम करना होगा। यह भी ध्यान रखने की बात है कि उनका 40 फीसदी बिजली का बकाया अभी तक राज्यों ने नहीं दिया है। नौकरशाही को कारगर बनाने के साथ रिजर्व बैंक की स्वायत्तता बहाल करनी होगी। इसके बाद प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआई जैसी केंद्रीय संस्थाओं की बेहतरी को प्राथमिकता में रखना होगा।

रोजगार मानवीय पूंजी है और जितना रोजगार सृजन होगा, उतनी ही स्थिति सुधरेगी। हालांकि पिछले तीन साल में 4.8 करोड़ लोगों ने स्वरोजगार शुरू किया है। ऐसे लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए लचीली नीतियों के आधार पर फंडिंग, मुफ्त कर्ज और रेगुलेटरी प्रक्रिया में ढील दी जानी चाहिए। निर्यात क्षेत्र और ई कॉमर्स में रोजगार बढ़ने की पूरी गुंजाइश है।

भारत फिलहाल 2.5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था है। वर्ष 2030 तक भारत की अर्थव्यवस्था सात ट्रिलियन डॉलर हो जाएगी। शहरीकरण विकास और नौकरियां अर्थव्यवस्था को विस्तार देने की कुंजी बनेंगी। अब देश में 2030 के विकास का एजेंडा तय किया जाना चाहिए, जिसके लिए सालाना 70 से 90 करोड़ स्कवेयर मीटर शहरी जगह की आवश्यकता होगी, जिससे कि शहरों के आसपास 70 फीसदी रोजगार सृजित हो सकें।

उम्मीद है कि नरेंद्र मोदी जब फिर से नए कार्यकाल में आएंगे, तो मजबूती के साथ दमदार आधारशिला पर बुनियादी काम आगे बढ़ाएंगे। उनके सामने हालांकि चुनौतियां भी होंगी। लेकिन अगर उन्होंने अपना काम तरीके से किया, तो आजादी की 75वीं वर्षगांठ पर भारत काफी समृद्ध और खुशहाल होगा।

लेखिका स्तंभकार नीति आयोग में वित्तीय समावेश और वित्तीय साक्षरता कमेटी की चेयरपर्सन हैं।

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