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नागरिकों की निगरानी का खतरा

Pavan Duggalपवन दुग्गल Updated Fri, 15 Nov 2019 07:20 AM IST
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आज की दुनिया की पारिस्थितिकी ऐसी है, जो राज्य सरकारों और नॉन स्टेट ऐक्टरों, दोनों को लोगों पर निगरानी रखने के लिए पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराती है। एक से एक उपकरण की बाढ़ और लोगों की उन पर बढ़ती निर्भरता ने संबंधित लोगों और संस्थाओं के लिए आंकड़ों पर निगरानी रखने की और भी उर्वर जमीन उपलब्ध करा दी है। इस्राइली फर्म के स्पाइवेयर पेगासस के जरिये व्हाट्सऐप पर पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की जासूसी के हालिया रहस्योद्घाटन से पता चलता है कि किस तरह भोले-भाले लोगों पर उनकी जानकारी के बगैर निगरानी रखी जा सकती है। अलबत्ता डाटा  संचालित अर्थव्यवस्था और समाज में, जहां डाटा ही तमाम लेन-देन और विचार-विमर्श के मूल में हैं, इस तथ्य की अनदेखी भी नहीं की जानी चाहिए कि इलेक्ट्रॉनिक डाटा में अवरोध पैदा करना दिनोंदिन बेहद मुश्किल होता जा रहा है। हालांकि इस संदर्भ में यह भी नहीं भूलना चाहिए कि डाटा की गैरकानूनी तरीके से मॉनिटरिंग या इनमें अवरोध पैदा करना किसी भी देश के मौजूदा कानूनी ढांचे और उनके प्रावधानों के खिलाफ हैं। हर देश के कानूनी ढांचे के पास गैरकानूनी तरीके से अवरोध डालने या मॉनिटरिंग को रोकने और इसकी जांच- पड़ताल करने की व्यापक गुंजाइश होती है।
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लेकिन जासूसी के मौजूदा खुलासे को देखते हुए यह कहना पड़ता है कि अगर निगरानी या जासूसी करने की इस प्रवृत्ति पर तत्काल प्रभाव से रोक नहीं लगाई गई, तो यह राज्य द्वारा अपने लोगों की जासूसी करने के एक विराट तंत्र में तब्दील हो सकती है। अगर ऐसा हुआ, तो यह सिर्फ उन्हीं लोगों के लिए खतरनाक नहीं होगा, जिनके डाटा पर निगरानी रखे जाने की आशंका है, बल्कि व्यापक अर्थ में यह हमारी स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों के लिए भी एक बड़ा खतरा होगा। इसलिए इस मामले में सभी हितधारकों को अपनी निजता को सुरक्षित और संरक्षित करने के लिए एकजुट होना चाहिए और उनको इस बारे में एकमत होना चाहिए कि वे गैरकानूनी ढंग से निगरानी के शिकार नहीं बनेंगे।

भारत ऐसा देश है, जिसका एक जीवंत संविधान है। यही नहीं, हम सबके पास संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार हैं, जिनमें जीने का अधिकार भी शामिल है। एक संप्रभु देश होने के नाते भारत सरकार के पास सूचना तकनीक कानून, 2000  की धारा 69  के तहत इलेक्ट्रॉनिक सूचनाओं को रोकने का अधिकार है। इसमें कहा गया है कि देश की संप्रभुता और सुरक्षा, दूसरे देशों के साथ दोस्ताना रिश्तों, शालीनता तथा नैतिकता की रक्षा के लिए तथा किसी संज्ञेय अपराध को रोकने के लिए सरकार अपने इस अधिकार का इस्तेमाल कर सकती है। इलेक्ट्रॉनिक डाटा को रोकने से संबंधित विस्तृत मानक भारतीय सूचना तकनीक कानून में दिए गए हैं। हालांकि इसका ध्यान रखना ही होगा कि किसी के खिलाफ यह कानून लागू करते हुए उन मानकों का अनुपालन किया जाए, जो हमारे कानून के अनुरूप हों।

व्हाट्सऐप पर जासूसी के इस मामले ने एक बार फिर बताया है कि मध्यस्थों यानी इंटरनेट की सुविधाएं प्रदान करने वाली कंपनियों से संबंधित हमारे मौजूदा कानून की समीक्षा करने की आवश्यकता है। सभी नेटवर्क सेवा प्रदाता कंपनियां बड़ी खिलाड़ी हैं और भारतीय कानून के अंतर्गत मध्यस्थ हैं। ये मध्यस्थ भारत में रहते हों या नहीं, अगर उनकी सेवाएं भारत में कंप्यूटरों और मोबाइलों पर उपलब्ध हैं, तो वे भारतीय साइबर कानून के दायरे में आते हैं, और इसलिए वे इस कानून का पालन करने के लिए बाध्य हैं। लेकिन हमने यह देखा है कि इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध कराने वाले विदेशी मध्यस्थों में से ज्यादातर भारतीय साइबर कानून का पालन करने के प्रति अनिच्छुक हैं।

यह इसी का नतीजा है कि सूचनाएं पेश करने से संबंधित हमारी सरकार के लगातार अनुरोधों की उन्होंने अनदेखी की है। यही नहीं, 'श्रेया सिंघल बनाम भारत सरकार' मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की भी उन्होंने गलत तरीके से व्याख्या की है, ताकि अपनी कानूनी जिम्मेदारी से बच निकल सकें। ऐसे में, मध्यस्थों से संबंधित कानूनी प्रावधानों को मजबूत करना जरूरी है। मध्यस्थों के प्लेटफॉर्मों पर साइबर सुरक्षा के उल्लंघन के ताजा उदाहरणों को देखते हुए हमारी सरकार को ऐसे कानूनी प्रावधानों के साथ आना चाहिए, जिनसे साइबर सुरक्षा सुनिश्चित हो। इनका पालन न करना मध्यस्थों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने का आधार होना चाहिए। हमें यह समझने की जरूरत है कि हमारा देश जिस डाटा आधारित अर्थव्यवस्था के निर्माण में लगा है, मध्यस्थ उस अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं।

ऐसे में,  एक व्यवस्थित साइबर समाज बनाने के लिए मध्यस्थों को स्वेच्छा से आगे आना चाहिए। लेकिन भारत में चूंकि आत्म विनियमन का रिकॉर्ड अच्छा नहीं है, ऐसे में, भारतीय सूचना तकनीक कानून, 2000 में संशोधन कर इसे ज्यादा व्यापक बनाया जाना चाहिए। तकनीक बहुत तेजी से  बदल रही है। लेकिन तथ्य यह है कि मध्यस्थों द्वारा साइबर सुरक्षा से संबंधित सख्त और बाध्यकारी कानून के अभाव के कारण पिछले आठ साल से ई-अर्थव्यवस्था का विकास उतनी तेज गति से नहीं हो पाया है, जितना होना चाहिए था।

सरकार को यह समझना होगा कि डाटा उपलब्ध कराने वाली कंपनियां ई-अर्थव्यवस्था के विकास की बुनियाद तो हैं, लेकिन उन्हें उनके कामकाज के लिए जिम्मेदार भी बनाया जाना चाहिए। व्हाट्सऐप पर जासूसी का मामला सरकार के लिए जागने और तत्काल कदम उठाने का अवसर होना चाहिए, ताकि भविष्य में जासूसी और निगरानी को रोकने के लिए एक व्यवस्था बनाई जा सके। इस तरह की घटना सभी हितधारकों के लिए भी जासूसी के खतरे से सावधान होने तथा इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए एकजुट होने का अवसर है। इस किस्म की एकजुटता और सजगता से एक ओर जहां हमारी स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित हो सकेगी, वहीं इससे सुरक्षित और व्यवस्थित साइबर स्पेस भी संभव हो सकेगा।

- सर्वोच्च न्यायालय में वकील और इंटरनेशनल कमिशन ऑन साइबर सेक्युरिटी लॉ के चेयरमैन।
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