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अंतिम यात्रा में भी जातिवाद! आजाद भारत में इस तरह की बैठक की आवश्यकता नहीं पड़नी चाहिए

सुभाषिनी सहगल अली Updated Fri, 23 Aug 2019 06:01 AM IST
सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : demo pic
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पंद्रह अगस्त और रक्षाबंधन एक ही दिन पड़ जाने से आजादी और भाईचारा, दोनों को एक साथ मनाने का मौका मिल गया। संयोग से मैं उस दिन तामिलनाडु में थी। 16 अगस्त को, मैं तंजावुर जिले के सेरागुड़ी गांव गई थी। वहां पता चला कि छुआछूत की पीड़ा से मौत के बाद भी छुटकारा नहीं मिल पाता है। इस गांव में अनुसूचित जाति को अपनों की लाश को ‘आम’ रास्ते से ले जाने पर मनाही है।
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इसे लेकर प्रशासन से कई बार शिकायत की गई है। कुछ माह पूर्व प्रशासन ने अनुसूचित जाति और गैर अनुसूचित जाति के लोगों (वानियर, जो एक पिछड़ी जाति है) के साथ बातचीत कर यह फैसला कर दिया कि अब अनुसूचित जाति की लाशों को ‘आम’ रास्तों से ले जाने पर आपत्ति नहीं की जाएगी।

आजाद भारत में इस तरह की बैठक की आवश्यकता नहीं पड़नी चाहिए। ‘आम’ रास्ते पर किसी को चलने से कैसे रोका जा सकता है? लेकिन, ‘आम’ का अंग्रेजी अनुवाद है ‘जनरल’, जिसका मतलब बहुत से लोग यह लगाते हैं कि जो कुछ जनरल है वह गैर-अनुसूचित जाति के लिए है। लेकिन बीते 13 अगस्त को अनुसूचित जाति की एक महिला अन्नलक्ष्मी की मौत हो गई।

14 तारीख को शवयात्रा से पहले ही गांव में बड़ी संख्या मे पुलिस और प्रशासन के लोग पहुंच गए। वहीं वानियर लोग अनुसूचित जाति की बस्ती की ओर जाने वाले ‘आम’ रास्ते को रोककर खड़े हो गए। अनुसूचित जाति के लोगों में बेचैनी पैदा हुई। फैसले के बाद भी ऐसा क्यों?
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