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दिल्ली, हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड में विधानसभा चुनाव से पहले पसोपेश में कांग्रेस

रशीद किदवई, वरिष्ठ पत्रकार Updated Tue, 17 Sep 2019 12:40 AM IST
कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक (फाइल फोटो)
कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक (फाइल फोटो) - फोटो : PTI
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हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड में होनेवाले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के लिए संभावनाएं न के बराबर हैं, लेकिन वह इन तीनों राज्यों की गैर भाजपा दलों से हाथ मिलाना चाहती है, ताकि चुनाव में भाजपा को कड़ी चुनौती दी जा सके। दरअसल लोकसभा चुनाव में खासकर उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा की विफलता ने समूचे विपक्ष का उत्साह खत्म कर दिया है। संसद के भीतर भी न तो तीन तलाक के मुद्दे पर विपक्ष का एकजुट तालमेल देखा गया और न ही हाल में गठित संसदीय समितियों में जगह पाने के लिए उसने कोई उत्साह दिखाया। तृणमूल नेताओं के प्रति सत्तारूढ़ दल का रवैया सही नहीं, लेकिन सरकारी नीतियों का विरोध करती अकेली तृणमूल ही दिखाई पड़ी।
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महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में बसपा की कमोबेश उपस्थिति है। लेकिन इन चुनावों में किसी के साथ गठबंधन करने के बजाय वह अकेले ही लड़ेगी। बसपा सुप्रीमो मायावती चुपचाप बैठी हुई नहीं हैं। इसके बजाय वह इन राज्यों के पारंपरिक जनाधार को एकजुट करना चाहती है। यह घटनाक्रम उस कांग्रेस के लिए बुरी खबर है, जिसने हरियाणा में अपनी एक दलित नेता सैलजा को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया है। हरियाणा कांग्रेस में किसी तरह की टूट को टालने के लिए भुपेंद्र सिंह हुड्डा को पार्टी में बनाए रखा गया है। इसके बावजूद कांग्रेस को हरियाणा में बीस या उससे अधिक सीटें पाने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ रहा है।

अब जब महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के लिए तैयार हो रहा है, तब अपने नेताओं को लगातार पालाबादल कर भाजपा में जाते हुए देखती कांग्रेस हैरान है कि मराठा वोटों पर निर्भरता के सहारे वह सत्तारूढ़ भाजपा-शिवसेना को चुनौती दे भी पाएगी या नहीं। महाराष्ट्र में कांग्रेस एनसीपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ने जा रही है। 1999 से कांग्रेस ने एनसीपी के साथ मिलकर तीन लगातार चुनाव लड़े हैं। लेकिन 2014 के विधानसभा चुनाव में चुनाव की घोषणा होने से कुछ घंटे पहले एनसीपी ने अकेले चुनाव लड़ने का एलान कर कांग्रेस को अधर में छोड़ दिया था।

कांग्रेस-एनसीपी के कटु विवाद से पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा को भारी लाभ हुआ और सीटों के मामले में उसने अपने सहयोगी शिवसेना को बहुत पीछे छोड़ दिया था। 288 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा ने 122 सीटें जीती थीं, जबकि शिवसेना को 62 सीटें ही मिली थीं। जबकि कांग्रेस और एनसीपी को क्रमशः 42 और 41 सीटें मिली थीं।

हालांकि इन दिनों कांग्रेस और एनसीपी, दोनों ही अपने नेताओं के पालाबदल से मुश्किल में है। वरिष्ठ एनसीपी नेता और छत्रपति शिवाजी के वंशज उदयनराजे भोंसले के भाजपा में शामिल हो जाने से एनसीपी और कांग्रेस, दोनों ही स्तब्ध हैं। उर्मिला मातोंडकर भले ही राजनीति में नई थीं, लेकिन उनके और निष्ठावान कृपाशंकर सिंह के कांग्रेस छोड़कर चले जाने से कांग्रेस का संकट बढ़ गया है। लगातार यह अटकल है (हालांकि इसके पक्ष में कोई ठोस तर्क नहीं है) कि अशोक चव्हाण और मिलिंद देवड़ा जैसे शीर्ष नेता भी कोई अकल्पनीय कदम उठा सकते हैं।
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