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लड़कियों की कामयाबी और हिंदी पट्टी की सुंदरता

मनीषा सिंह Updated Fri, 28 Jun 2019 05:43 AM IST
Beauty of the hindi belt
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टीवी, फिल्मों या सौंदर्य प्रतियोगिताओं में विजयी रहने वाली लड़कियों की कामयाबी को लेकर हमारे समाज में एक ग्रंथि कायम रही है। माना जाता है कि ऐसे ज्यादातर क्षेत्रों में स्त्रियां अपनी योग्यता के कारण नहीं, सिर्फ शारीरिक सुंदरता के बल पर जीतती हैं। पर जब हम हाल में फेमिना मिस इंडिया चुनी गई शीर्ष तीन लड़कियों पर नजर डालते हैं, तो वहां हमें एक खास संदेश देखने को मिलता है। इस बार प्रतियोगिता में पहले के तीन स्थानों और रनर अप के लिए महानगरीय स्टीरियोटाइप लड़कियों के बजाय राजस्थान, छत्तीसगढ़, बिहार जैसे राज्यों की और सीए, इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट जैसे आला विषयों की पढ़ाई कर रही लड़कियों ने कब्जा जमाया है।
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मुमकिन है कि इस किस्म का चुनाव करते हुए आयोजकों का खास उद्देश्य रहा हो। बाजार की जो ताकतें अब महानगरों से नीचे उतरते हुए पिछड़े राज्यों के उपेक्षित इलाकों में अपने बिजनेस के अवसर खोज रही हैं, उनका कोई दबाव इस चयन के पीछे काम कर रहा हो। पर प्रतियोगिता में सफल रही राजस्थान की सुमन राव, छत्तीसगढ़ की शिवानी जाधव और बिहार की श्रेया शंकर हिंदी पट्टी के जिन पिछड़े राज्यों से ताल्लुक रखती हैं, वहां ऐसी कामयाबी के मायने बाजार से ज्यादा लड़कियों के अंदर सपनों का पीछा करने की ललक जगने के संदर्भ में ज्यादा हैं।

सौंदर्य प्रतियोगिता में मिली सफलता को अब सुंदरता के आधार पर मिली कामयाबी भर नहीं माना जाता। हालांकि इसके पीछे जो आशंकाएं हैं, उसके दो पक्ष हैं। एक पक्ष वह है, जिसमें स्त्री मर्दों के हाथ का खिलौना और अरबों डॉलर वाले सुंदरता के वैश्विक बाजार का उपयोगी माध्यम है। दूसरा पक्ष वह है, जिसमें यही स्त्री अपने कौशल के बल पर नित नए क्षेत्रों में सफलता के कीर्तिमान स्थापित कर रही है, हालांकि ऐसा करते हुए भी सुंदर दिखने की उसकी शाश्वत इच्छा में कोई कमी नहीं आई है। ज्यादातर सौंदर्य प्रतियोगिताएं इसलिए बेमानी ठहराई जाती हैं, क्योंकि उनमें प्रतिभागी लड़कियों से सिर्फ सुंदर दिखने की अपेक्षा की जाती है और ज्ञान का स्तर नापने के लिए बेहद साधारण सवाल पूछे जाते हैं। इन आधारों पर साबित करने की कोशिश होती है कि महिलाओं के तर्क का स्तर पुरुषों से कमतर होता है। एक तर्क यह भी है कि ऐसी प्रतियोगिताएं इस रूढ़िवादी सोच को बढ़ावा देते हैं कि सिर्फ सुंदर दिखकर ही आगे बढ़ा जा सकता है। पर इस सच का एक पहलू यह भी है कि महिलाएं कठिन से कठिन मापदंडों पर खरी उतर रही हैं।

सौंदर्य को दो पैमानों पर आंकना चाहिए। एक स्त्री का प्राकृतिक सौंदर्य है। दूसरी है सांस्कृतिक सुंदरता। पर समाज स्त्री सौंदर्य के दूसरे पहलू को पकड़ नहीं पा रहा। अच्छी बात यह है कि सौंदर्य प्रतियोगिता के जिन मंचों पर सुंदरता का ज्यादा महत्व माना जाता है, वहां भी ये लड़कियां अपनी बुद्धिमता का परिचय दे रही हैं। वैसे ही, जैसे दशकों पहले मिस वर्ल्ड पहली भारतीय रीता फारिया ने सुंदरता का कीर्तिमान स्थापित करने के बाद डॉक्टर बनकर समाज की सेवा की थी।

आज हर मोर्चे पर पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी स्त्री की सुंदरता का वह उद्देश्य नहीं रहा, जो पहले था। अब जरूरी है कि स्त्री के आगे बढ़ने की प्रक्रिया को देह की सुंदरता से जोड़े रखने की मानसिकता के बजाय इस नजर से देखा जाए कि आज विभिन्न पेशों में स्त्रियां जिन ऊंचे मुकामों पर हैं, वहां वे अपनी जेहनियत की वजह हैं, न कि महज शारीरिक सौंदर्य के बल पर।
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