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कश्मीर की लड़ाई जलालाबाद और काबुल में!

प्रदीप कुमार Updated Wed, 18 Sep 2019 02:50 AM IST
Donald Trump- Imran Khan
Donald Trump- Imran Khan
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अतीत की कई घोषणाओं की तरह तालिबान से गुप्त वार्ता रद्द करने में भी कोई ठोस तर्क नहीं दिखाई पड़ता। ट्रंप ने तालिबान, अफगानी राष्ट्रपति अशरफ गनी और अमेरिकी प्रशासन के प्रतिनिधियों की वार्ता शुरू होने से ठीक पहले यह फैसला किया। उन्होंने कहा, 'अगर तालिबान महत्वपूर्ण शांति वार्ता से पहले 12 निर्दोषों की जान तक ले सकते हैं, तो इसका अर्थ यही है कि सार्थक समझौते के लिए वार्ता की ताकत उनमें नहीं है। और कितने दशक तक वे जंग करना चाहते हैं?' अमेरिका में तीनों पक्षों के बैठने की सहमति के दौरान और उससे पहले भी तालिबान आतंकी वारदातें कर रहे थे। तो फिर नया क्या हुआ?
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तालिबान की तात्कालिक प्रतिक्रिया यह है कि अमेरिका को खामियाजा भुगतना पड़ेगा। पर भारत और अन्य देशों के लिए अहम संकेत अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की विदेश मामलों संबंधी समिति ने दिया है। डेमोक्रेटिक पार्टी की बहुमत वाली इस समिति के अध्यक्ष एलियट एंगल ने तालिबान से वार्ता करने वाले अमेरिकी वार्ताकार जलमय खलीलजाद को तलब किया है। उन्होंने कहा, 'दो हजार से अधिक अमेरिकी अफगानिस्तान में मारे जा चुके हैं। प्रशासन अमेरिकी संसद और जनता को वार्ता के बारे में अंधकार में रखे हुए है। हम इससे आजिज आ चुके हैं।' प्रतिनिधि सभा की समिति ट्रंप को कटघरे में खड़ाकर उनकी छवि धूमिल करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। यह मामला चुनावी राजनीति से भी जुड़ा हुआ है। अफगानिस्तान में सैनिक हस्तक्षेप के बाद अमेरिका अपना मिशन अभी तक नहीं पूरा कर सका और अमेरिकी जनता भी थकी नजर आ रही है।

सवाल उठता है कि युद्ध के मैदान में अपराजित तालिबान बातचीत की मेज पर वह सब क्यों देने वाले, जो अमेरिका लड़कर नहीं हासिल कर पाया। कश्मीर के हालिया घटनाक्रम के मद्देनजर पाकिस्तान भी ऐसा नहीं होने देगा। तालिबान की मजबूती में ही पाकिस्तान का सामरिक हित है। चीन अशरफ गनी सरकार और तालिबान, दोनों से संपर्क बनाए हुए है। यही बात रूस पर भी लागू होती है। तालिबान सत्ता में आ जाएं, तो इन दोनों देशों का कुछ बिगड़ने वाला नहीं। वे बस इतना सुनिश्चित करना चाहेंगे कि पूर्वी तुर्किस्तान और मध्य एशियाई देशों में उग्रवाद न भड़काया जाए। पाकिस्तान इसमें सहायक अवश्य बनेगा। अब बचा भारत! अल कायदा व तालिबान में गहरे रिश्ते हैं और इन दोनों से मिली हुई है पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई। पाकिस्तान हर हाल में अपनी इस सबसे खतरनाक स्ट्राइक कोर का इस्तेमाल कश्मीर और भारत के अन्य हिस्सों में करना चाहेगा।

तालिबान काबुल में काबिज हो जाएं, तो भारत को क्या करना चाहिए? भारत के तरकश में कई तीर हैं। पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच की बनावटी रेखा, डुरंड लाइन पर कुशल कूटनीतिक प्रयासों से मतभेदों को हवा दी जाए। तालिबान शासन के दौरान पाकिस्तान ने तीन बार इस रेखा को औपचारिक मान्यता दिलवाने की कोशिश की। काफी हद तक पाकिस्तान की मदद पर टिके तालिबान ने तीनों बार इनकार कर दिया। अफगानिस्तान में जनतांत्रिक सरकार हो या तालिबान, डुरंड लाइन को तस्लीम करना किसी के बस की बात नहीं है। कोई कारण नहीं है कि भारत की राज्य सत्ता अफगान जनता के संशोधनवादी दावों को मजबूत न कर सके। पिछली बार भारत सरकार और तालिबान में संपर्क तो थे, मगर प्रभावी नहीं। सामरिक हितों का तकाजा यह है कि इन संपर्कों को प्रगाढ़ किया जाए। पाकिस्तान को 'सामरिक पहुंच' से वंचित करने में यह महत्वपूर्ण होगा। कारगर कूटनीति तालिबान के भारत विरोधी रुख को कुंद कर सकती है।

पाकिस्तान में 1947 से शिया मुसलमानों का उत्पीड़न लगातार चल रहा है। अफगानिस्तान और पाकिस्तान की सीमाओं से लगा ईरान शिया बहुल है। ट्रंप की घोषणा के बाद ईरान के विदेश मंत्री ने कहा, 'तालिबान इस्लामी अमीरात चाहते हैं। वे जनतांत्रिक व्यवस्था नहीं चाहते। अमीरात खतरनाक है, क्योंकि इसमें जनता का स्थान नहीं होगा। अफगानिस्तान की मौजूदा संस्थाओं को नष्ट नहीं किया जाना चाहिए।' ईरान का रुख भविष्य के लिए कई उम्मीदें पैदा करता है। अमेरिकी दबाव में ईरान के साथ हमारे संबंधों में गर्मजोशी कम हुई है। चाबहार बंदरगाह के प्रति जोश भी फीका हुआ है। इसका परोक्ष लाभ पाकिस्तान को हुआ। खुद अमेरिका से संकेत आ रहे हैं कि वह ईरान के प्रति नरम रुख अपनाना चाहता है। अमेरिका नरम रुख न अपनाए, तब भी भारत को ईरान नीति में बदलाव लाने होंगे। पाकिस्तान, तालिबान और अल कायदा के त्रिभुज को ईरान से सार्थक दोस्ती के बिना नहीं तोड़ा जा सकता।

कश्मीर की लड़ाई जलालाबाद से लेकर ताजिकिस्तान और ईरान से लगी अफगान सीमा पर लड़नी होगी। पाकिस्तानी मंसूबों को नाकाम करने के लिए नया उत्तरी मोर्चा जरूरी है। उत्तरी मोर्चे के नेता शाह मसूद की हत्या से भारत को जो क्षति पहुंची थी, अब तक उसकी भरपाई नहीं हो पाई। इस महीने के अंत में अफगानिस्तान में राष्ट्रपति चुनाव और उसके नतीजे से स्थिति में शायद ही गुणात्मक परिवर्तन आ पाए। तालिबान पहले ही एलान कर चुके हैं कि वे इस चुनावी प्रक्रिया को नहीं मानते। तालिबान के इस्लामी अमीरात में लोकतांत्रिक चुनाव के लिए स्थान नहीं है। पाकिस्तान कूटनीतिक लिहाज में नई सरकार से संबंध रखेगा, लेकिन उसकी पुरजोर कोशिश उसे विफल करने की होगी। पाकिस्तान के दो अधूरे एजेंडे हैं-एक, कश्मीर को हथियाना और दूसरा, काबुल में कमजोर सरकार, जो डुरंड रेखा को मान्यता दे दे और पाकिस्तान को सामरिक पहुंच भी मुहैया कराती रहे। कश्मीर में अनुच्छेद 370 के खात्मे के बाद वहां अशांति फैलाने के लिए पाकिस्तान एड़ी-चोटी का जोर लगा रहा है।

पाकिस्तान के ये अधूरे एजेंडे एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, इसलिए भारत का संघर्ष भी कई मोर्चों पर है। अफगानिस्तान में शांति के नाम पर तालिबान की मध्ययुगीन मांगें न मानी जाएं, विधिवत निर्वाचित राष्ट्रपति को सभी पक्ष मान्यता दें, बंदूक के बल पर कोई हुकूमत न करने पाए और इन सबको अंतरराष्ट्रीय समर्थन प्राप्त हो, तो पाकिस्तान एक मोर्चे की लड़ाई हार जाएगा। उसकी दूसरी हार तब होगी, जब खैबर पख्तुनख्वा और बलूचिस्तान में पाकिस्तान त्राहिमाम करने लगे।
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