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असम तो हाथ से फिसल रहा है

प्रदीप कुमार Updated Mon, 08 Jan 2018 05:46 PM IST
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असम में पूर्वी बंगाल/बांग्लादेश से आए अवैध प्रवासियों और घुसपैठियों के खिलाफ करीब छह साल चले विराट आंदोलन के बाद 15 अगस्त 1985 को प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने जब लाल किले के प्राचीर से ऐतिहासिक समझौते की घोषणा की थी, तब  उम्मीद पैदा हुई थी कि राज्य के जनसांख्यकीय स्वरूप को बदलने की प्रक्रिया रोकी जा सकेगी।
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समझौते की खास बात यह थी कि मार्च 1971 के बाद आने वालों की पहचान की जाएगी। 1951 में बने असम में भारतीय नागरिकों के रजिस्टर को आधार माना गया। समझौते के 33 साल बाद नए साल की शुरुआत पर जारी रजिस्टर के मसौदे में 1.9 करोड़ लोगों के नाम दर्ज हैं और 1.4 करोड़ के नामों की पुष्टि की जा रही है। कुल 3.3 करोड़ अर्जियां प्राप्त हुई थीं। सरकार ने भरोसा जताया है कि इस साल के अंत तक नागरिकता रजिस्टर मुकम्मल हो जाएगा। मसौदे पर कई विवाद पैदा हो गए हैं। तय है, पूरा रजिस्टर बनने के बाद विवाद बढ़ेंगे, क्योंकि राज्य के सभी निवासियों को उसमें शामिल कर पाना नामुमकिन होगा। 

असम में गैर असमियों की निर्बाध वृद्धि और निरंतर हो रहे जनसांख्यकीय परिवर्तन का विषय इतना जटिल है कि इतिहास में जाए बगैर उसे नहीं समझा जा सकता। ईस्ट इंडिया कंपनी और बर्मा के बीच 1826 की यंदाबू संधि के तहत भारत में असम के शामिल होते ही यह प्रक्रिया शुरू हो गई थी। असम में जंगल और जमीन की इफरात थी, मगर आबादी कम। अंग्रेज की निगाह असम में नए कारोबार और मुनाफे के विस्तार पर थी। इसलिए लाखों की संख्या में बंगाल के पूर्वी हिस्से से, जहां बाद में पूर्वी पाकिस्तान बना, लोगों को बसाया जाने लगा।

नतीजतन 1871 तक ग्वालपाड़ा, नौगांव, दारांग और कामरूप की आबादी का अनुपात बदल गया। वर्ष 1939 में सादुल्ला की सरकार बनने के बाद पूर्वी बंगाल से आमद में तेजी आई। सादुल्ला मुसलिम लीगी थे और 1905 में ढाका में नवाब की अध्यक्षता में हुए लीग के स्थापना समारोह में असम में पूर्वी बंगाल की मुस्लिम आबादी को बसाने का निश्चय किया जा चुका था।
उस फैसले के पीछे आर्थिक कारण भी थे। वर्ष 1947 में पूर्वी पाकिस्तान की स्थापना की जड़ें 1905  के बंगाल में थीं और सिलहट का असम से अलग होना भी उसी का हिस्सा था।

वर्ष 1971 में 'सेक्यूलर गणतांत्रिक' बांग्लादेश की स्थापना करने वाले शेख मुजीबुरर्हमान की असम पर निगाह आर्थिक कारणों से थी। उन्होंने लिखा था, ‘पूर्वी पाकिस्तान को विस्तार के लिए पर्याप्त जमीन चाहिए और चूंकि असम में कोयला, पेट्रोलियम, अन्य खनिज साधनों और जंगल की भरमार है, इसलिए पूर्वी पाकिस्तान की आर्थिक मजबूती के लिए असम को उसमें शामिल किया जाना चाहिए। मौलाना भासानी 'वामपंथी' थे, लेकिन नीति उनकी भी यही थी। 1971 में नया देश बनने के बाद मुजीब की नीति बदली।

लेकिन 1975 में उनकी हत्या के बाद बनने वाली फौजी सरकारों और बाद में बेगम खालिदा की सरकार ने न सिर्फ पूर्वोत्तर के हथियारबंद विद्रोहियों के अपने यहां अड्डे बनाने में आईएसआई की मदद की, बल्कि अवैध आव्रजन को भी प्रोत्साहित किया। अब शेख हसीना कह रही हैं कि भारत में कोई अवैध बांग्लादेशी नहीं है, जबकि नवंबर 1998 में भारत के कम्युनिस्ट गृह मंत्री इंद्रजीत गुप्त स्वीकार कर चुके हैं कि देश में करीब एक करोड़ अवैध प्रवासी हैं। तब से संख्या बढ़ी ही होगी। 

गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने लोकसभा में आश्वासन दिया है कि नागरिकता रजिस्टर के आधार पर किसी को जबरन बाहर नहीं किया जाएगा।

असम के मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल कहते हैं कि जब तक केंद्र सरकार अंतिम फैसला नहीं करती, तब तक विदेशी मानवीय आधार पर रह सकते हैं; रोटी, कपड़ा और शरण के अलावा उन्हें कुछ भी नहीं मिल सकता। व्यावहारिक बात यह है कि भारत उन्हें बाहर कर भी नहीं सकता। एक तो बांग्लादेश के साथ कोई संधि नहीं है।
दूसरे महाराष्ट्र से सिर्फ 34 बांग्लादेशियों के निष्कासन पर मची हायतौबा एक मिसाल है। तब फिर एक करोड़ से अधिक विदेशियों का अंततोगत्वा होगा क्या? समस्या के जर्रे-जर्रे से वाकिफ, 1998  में असम के राज्यपाल ले.ज.एसके सिन्हा ने राष्ट्रपति को लिखे लंबे पत्र में मजबूरी जताई थी कि गैरकानूनी बांग्लादेशियों को बाहर निकालना व्यावहारिक विकल्प नहीं है।

उनका सुझाव था कि उन्हें राज्यविहीन नागरिक घोषित किया जाए, जिन्हें वोट और अचल संपत्ति खरीदने का अधिकार नहीं होगा। दीर्घकालीन समाधान इससे भी नहीं निकलने वाला। संघ परिवार की घोषित नीति के तहत मोदी सरकार ने हिंदू प्रवासियों को नागरिकता देने के लिए 2016 में एक विधेयक तैयार किया था।
 
असम में भाजपा के साथ सरकार में शामिल असम गण परिषद ने चेतावनी दी है कि विधेयक पास हुआ, तो वह सरकार से अलग हो जाएगी। अगप इस मसले को हिंदू-मुस्लिम चश्मे से नहीं देखती। याद होगा, आंदोलन के दौरान नेल्ली के नर संहार में असमिया मुसलमानों पर हमला नहीं हुआ था, केवल बांग्लाभाषी मुसलमान निशाना बने थे।
 
अन्य पार्टियां भी सरकार का समर्थन नहीं करने वालीं। मान भी लें कि सभी हिंदू बांग्लादेशियों को भारत की नागरिकता मिल जाती है, तो उस हालत में मुसलमानों में बेचैनी पैदा होगी और गुवाहाटी से लेकर दिल्ली, इस्लामाबाद तक उन्हें भड़काने वाले भी खासी तादाद में होंगे। 

भारत-बांग्लादेश सीमा पर बीएसएफ की चौकसी अवैध आगमन रोकने में विफल रही है। आरोप है कि कुछ सुरक्षाकर्मी उस पार से आवाजाही को सुगम बनाते रहते हैं। भारत-बांग्लादेश सीमा की संरचना आवाजाही रोकने में स्थायी बाधा बनी रहेगी।
 
ढाका से गुवाहाटी-कोलकाता और समूचे पूर्वोत्तर पर चीन और पाकिस्तान की गहरी गिद्ध दृष्टि, आतंकवाद और अलगाववाद के बढ़ते खतरे व आंतरिक सुरक्षा के व्यापक दायरे में अवैध बांग्लादेशियों के मसले का हल ढूंढने के संकल्प में ही राष्ट्र का हित है। त्वरित और संकीर्ण लाभ पाने की क्षुद्र राजनीति जटिलता को बढ़ाती जाएगी।

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