कृत्रिम ग्लेशियर बनाकर किसानों की मदद की

चेवांग नोरफेल/ अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Tue, 07 Nov 2017 01:01 PM IST
artificial glaciers will help farmers to produce more crops 
प्रतीकात्मक तस्वीर
मैं जम्मू-कश्मीर के ग्रामीण विकास विभाग के अंतर्गत लद्दाख के जंसकार में पैंतीस साल तक सेवाएं देने वाला इक्यासी वर्षीय पूर्व अधिकारी हूं। मैंने 1960 में लखनऊ से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की पूरी की थी। उसी साल मुझे नौकरी मिल गई थी। नौकरी के दौरान मेरा काम कुछ ऐसा था कि लद्दाख क्षेत्र के प्रत्येक गांव में सड़क, पुल, इमारत या सिंचाई प्रणाली बनाने में मेरी हिस्सेदारी जरूर रही। 
मैं लद्दाख के ठंडे पर्वतीय रेगिस्तान में रहता हूं। यहां की 80 प्रतिशत आबादी खेती पर निर्भर है और उनके सिंचाई का मुख्य स्रोत वह पानी है, जो बर्फ और ग्लेशियरों के पिघलने से आता है। लेकिन ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्लेशियरों के स्वरूप में तेजी से बदलाव हो रहे हैं। यही वजह है कि सर्दियों के महीनों में पानी बर्बाद हो जाता है। इसलिए मैंने सोचा कि अगर मैं पानी को बर्फ के रूप में संरक्षित कर सकूं, तो सिंचाई की अवधि में किसानों की काफी हद तक मदद की जा सकती है। 

यह विचार पहली बार मेरे दिमाग में तब आया, जब मैंने देखा कि एक नल से पानी टपक रहा था, जिसे जानबूझ कर खुला रखा गया था, ताकि सर्दियों में पानी के जमने से नल का पाइप फटे न। पर जब ठंड बढ़ी, तो पानी धीरे-धीरे जमीन से जुड़ते हुए एक बर्फ की तार के आकार में परिवर्तित हो गया। मेरे लिए यह दृश्य गर्मियों से पहले वसंत में किसानों को होने वाली पानी की किल्ल्त खत्म करने के लिए एक समाधान की तरह सामने आया। और इसी को आधार बनाकर मैंने कृत्रिम ग्लेशियर बनाने का काम शुरू कर दिया।

मैंने इस काम के लिए अपने संपूर्ण इंजीनियरिंग ज्ञान, अनुभव को जुनून के मिश्रण के साथ प्रयोग किया। मैंने अपना पहला प्रयोग फुत्से गांव में शुरू किया। सबसे पहले मैंने पानी की मुख्यधारा से जुड़ती हुई एक नहर बनाई, जोकि गांव से चार किलोमीटर दूर एक ऐसे इलाके से जुड़ती थी, जहां पानी इकट्ठा किया जा सकता था। मैंने उस हिस्से को ऐसा आकार दिया, जहां सर्दियों में पानी जमाया जा सके।
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