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वीआईपी कल्चर के विरुद्ध: वह दिन कब आएगा प्रधान सेवक जी ?

तवलीन सिंह Updated Mon, 23 Sep 2019 07:36 AM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह - फोटो : a
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सोशल मीडिया पर यह वीडियो शायद पिछले कई महीनों से वायरल हो रहा है, लेकिन मुझे पिछले ही सप्ताह यह वीडियो किसी ने भेजा। इसमें दिल्ली पुलिस के जवानों ने एक एंबुलेंस को नाके पर रोक रखा है और उस एंबुलेंस का ड्राइवर उनसे मिन्नतें कर रहा है कि जिस बच्चे को वह अस्पताल लेकर जा रहा है, उसकी हालत गंभीर है। अंदर एक बच्चा बेहोश दिखाई देता है, जिसके पास उसका पिता बैठा है, जो हाथ जोड़कर पुलिस वालों से कहता दिखता है कि बच्चे का खून बह रहा है, सो एंबुलेंस का फौरन निकलना जरूरी है। इतने में सड़क पर लोगों की भीड़ इकट्ठा हो जाती है और लोग पुलिस वालों पर दबाव डालने लगते हैं, लेकिन एंबुलेंस को निकलने की इजाजत इसलिए नहीं मिलती, क्योंकि किसी वीआईपी राजनेता के काफिले के लिए रूट बंद कर दिया गया है।
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वीडियो देखकर मुझे रोना भी आया और गुस्सा भी। मैंने जब यह वीडियो ट्वीटर पर डाला, तो ऐसी ही भावनाएं दूसरे लोगों ने भी व्यक्त कीं। लेकिन भाजपा के कुछ समर्थक ऐसे भी थे, जिन्होंने मुझे गालियां दीं और मुझ पर फेक न्यूज फैलाने का इल्जाम लगाया। उनकी शिकायत थी कि एक वरिष्ठ पत्रकार होने के नाते मुझे यह तो मालूम करना चाहिए था कि वीडियो पुराना है और एंबुलेंस भाजपा के किसी नेता के लिए नहीं रोकी गई थी, बल्कि किसी विदेशी राष्ट्रपति के काफिले के गुजरने के लिए रूट बंद किया गया था। ट्वीटर पर अक्सर ऐसे लोग ऊंचे स्वर में ट्वीट करते हैं, जो कुएं के मेंढक होते हैं। सो उनको मालूम नहीं कि इस तरह का वीआईपी कल्चर सिर्फ उन देशों में दिखता है, जो कभी गुलाम हुआ करते थे।

जल्दी ही हमारे प्रधानमंत्री संयुक्त राष्ट्र की आमसभा में शामिल होने न्यूयॉर्क पहुंचेंगे। दुनिया के सबसे बड़े राजनेता उस महानगर में उपस्थित होंगे, लेकिन उनके काफिले के लिए सड़कें बंद नहीं की जाएंगी। उनकी सुरक्षा कड़ी रहेगी, लेकिन आम लोगों के लिए असुविधा सिर्फ इतनी होगी कि जिस इमारत में संयुक्त राष्ट्र का दफ्तर है, उसके आसपास आना-जाना मुश्किल होगा। नरेंद्र मोदी जब 2014 में पहली बार वहां गए थे, तो मैं न्यूयॉर्क में थी। सो मैंने अपनी आंखों से देखा था कि आम नागरिक को तंग किए बगैर किस तरह विश्व के सबसे शक्तिशाली राजनेताओं को सुरक्षा दी जाती है। किसी राजनेता के काफिले के लिए एंबुलेंस रोकना अपराध माना जाता है। हमारे राजनेताओं को वीआईपी कल्चर की इतनी आदत है कि दिवंगत नरसिंह राव बतौर प्रधानमंत्री जब पहली बार दावोस गए, तो हमारी सरकार ने स्विस सरकार से पूरा रूट बंद करने की दरखास्त की थी। लेकिन उस अनुरोध को खारिज कर दिया गया। दावोस में जब यह खबर फैली, तो हम भारतीयों को शर्मिंदगी महसूस हुई। वह दिन कब आएगा, जब हमारे राजनेताओं को शर्मिंदगी महसूस होगी?

नरेंद्र मोदी खुद को प्रधान सेवक मानते हैं। वह दिन कब आएगा प्रधान सेवक जी, जब आप दिल्ली की सड़कों से वीआईपी रूट लगाए जाने की यह गलत परंपरा खत्म करके दिखाएंगे? दिल्ली वालों को रोज किसी न किसी नाके पर रोका जाता है और सुरक्षा के बहाने किसी वीआईपी के काफिले को प्राथमिकता मिलती है। सुरक्षा वास्तव में बहाना है। असली चिंता इन वीआईपी राजनेताओं को अपनी शान की है। उनकी अपनी नजरों में उनका स्थान इतना ऊंचा होता है कि वे कल्पना नहीं कर सकते कि बिना रूट बंद किए उनका काफिला पूरी सुरक्षा के साथ गुजर सकता है। इस कारण किसी गरीब का बच्चा मर जाता है, तो उनको क्या! उनकी झूठी शान बच्चे की जान से ज्यादा है।
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