प्रकृति की लूट के विरुद्ध

यादवेंद्र Updated Mon, 07 Jan 2019 07:08 PM IST
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पिछले दिनों उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने प्राकृतिक संसाधनों की लूट कर अंधेरे में बेहिसाब मुनाफा जोड़ते चले जाने की सालों साल से चली आ रही प्रवृत्ति के खिलाफ दूरगामी फैसला दिया। उत्तराखंड राज्य बायोडाइवर्सिटी बोर्ड ने 'फेयर ऐंड इक्विटेबल बेनिफिट शेयरिंग' के सिद्धांत के अनुसार जब एक दवा कंपनी को मुनाफे का एक हिस्सा उत्पादनकर्ताओं और संरक्षकों के साथ बांटने का नोटिस दिया, तो उसने इसे अनदेखा कर दिया और अदालत की शरण ली।
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बायोडाइवर्सिटी कानून की सीधी और शब्दशः व्याख्या करते हुए अदालत ने कहा, राष्ट्र की भौगोलिक सीमा के अंदर पैदा होने वाली सारी जैविक संपदा निर्विवादित तौर पर राष्ट्र की अमानत है, पर वास्तविक अर्थों में इन्हें स्थानीय और मूल निवासियों की संपदा माना जाना चाहिए, जो सदियों से उन्हें अपना खून-पसीना बहाकर संरक्षित रखते आए और उन्हें अगली पीढ़ी को सौंपते रहे हैं। 
1993 में संपन्न कन्वेंशन ऑफ बायोलॉजिकल डाइवर्सिटी (सीबीडी) पर हस्ताक्षर करने वाले देशों में भारत अग्रणी था और उसके तत्काल बाद इसने दुनिया के सामने इसको कार्यरूप में परिणत कर दिखाया, जिसकी दुनिया भर में सराहना हुई। इस समझौते का एक प्रमुख बिंदु था : जैविक संसाधनों के उपयोग से होने वाले लाभों की न्यायसंगत साझेदारी। पारंपरिक रूप से जड़ी-बूटियों से आम बीमारियों का इलाज करने वाली केरल की कानी जनजाति के साथ केरल के ट्रॉपिकल बोटैनिकल गार्डन ऐंड रिसर्च इंस्टीट्यूट और कोयंबटूर की आर्य वैद्य फार्मेसी ने सहभागिता कर जीवनी नाम की शक्तिवर्धक औषधि बनानी शुरू की और मुनाफे का आधा हिस्सा आरोग्यपाचा नामक वनस्पति के औषधीय गुणों का पारंपरिक ज्ञान  रखने वाली कानी जनजाति के सामुदायिक ट्रस्ट को देना शुरू किया।
आर्थिक हितों को सर्वोपरि मानने की औद्योगिक संस्कृति में भी जीवनी का अस्तित्व में आना और कानी जनजाति तक मुनाफे का पहुंचना दुनिया भर में चर्चित हुआ और अनेक देशों ने इस तर्ज पर काम शुरू किया। 

भारत दुनिया में जैव विविधता का प्रमुख केंद्र है, जिसकी भौगोलिक सीमाओं के अंदर विश्व की सिर्फ 2.4% भूमि है, जिस पर जीव और वनस्पतियों की सात से आठ फीसदी प्रजातियों का निवास है। हाल में प्रकाशित एक रिपोर्ट बताती है कि पिछले तीन साल में देश के लगभग साढ़े छत्तीस हजार हेक्टेयर जंगल सड़क और रेल लाइनों, खनन और जलविद्युत परियोजनाओं की बलि चढ़ गए। जैव विविधता के विनाश के इन प्रतिकूल प्रभावों का असर अब दुनिया के बड़े व्यापारिक प्रतिष्ठानों के मुनाफों पर पड़ने लगा है-जब समुद्र में मछलियां नहीं होंगी, तो मछली का व्यापार करने वाले प्रतिष्ठान कमाएंगे क्या?

जब धरती पर जल नहीं होगा, तो मिनरल वाटर के कारोबार का क्या होगा? इसलिए अब बहुराष्ट्रीय कंपनियां मिलकर जैव विविधता संरक्षण के लिए आवश्यक धन जुटाने के लिए आगे आने लगी हैं। 
विनाश की खबरों के बीच कुछ प्रेरक उदाहरण भी सामने आ रहे हैं-अरुणाचल प्रदेश के बुगुन समुदाय के लोगों ने सामुदायिक प्रयासों से 17 वर्ग किलोमीटर का संरक्षित वन बनाया और पक्षियों की एक दुर्लभ प्रजाति को बचाने का संकल्प लिया। नगालैंड के लोंगलेंग जिले के लेम्सचेंलोक समुदाय ने दस वर्ग किलोमीटर का सामुदायिक वन बनाकर विलुप्तप्राय एमुर बाज सहित अनेक प्रजातियों का संरक्षण शुरू किया है-इस वन में पक्षियों की 85 और मेंढकों की 15 प्रजातियां पल रही हैं।
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