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अफ-पाक क्षेत्र में साहसिक पहल की दरकार

r vikram singhआर विक्रम सिंह Updated Sun, 16 Feb 2020 05:48 AM IST
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सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
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करीब चार दशक पहले 24 दिसंबर 1979 को जब सोवियत सेनाएं काबुल में उतरने लगी, उससे पहले का अफगानिस्तान दुनिया के लिए कोई समस्या नहीं था। यह और भी बड़ी समस्या तब बना, जब पाकिस्तान और सीआईए ने सोवियत सेनाओं के विरुद्ध जेहादी-तालिबानी अभियान चलाया। इस प्रक्रिया ने उन शक्तियों को जीवित कर दिया, जिनसे पार पाने का कोई रास्ता आज उन्हें भी नहीं मिल रहा है। सितंबर 2019 में राष्ट्रपति ट्रंप ने अचानक अमेरिका-तालिबान वार्ताएं भंग कर दी थीं। अमेरिकी राजदूत खलीलजाद की सक्रियता से वार्ताएं पुनः प्रारंभ होने के आसार हैं। अमेरिका, राष्ट्रपति चुनाव से पहले घर वापसी का सम्मानजनक रास्ता तलाश रहा है।
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प्राचीन इतिहास को छोड़ दें तो 17 नवंबर, 1747 से पहले अफगानिस्तान एक देश की शक्ल में नहीं था। अहमदशाह दुर्रानी के विरुद्ध ईरानियों की पराजय ने पख्तूनों को ईरान और सिंध नदी के मध्य सबसे प्रभावी शक्ति बना दिया था। इस प्रभाव क्षेत्र का विस्तार दक्षिण में बलोच क्षेत्रों सहित अरब सागर तक कायम हुआ। यहां से अफगानिस्तान की पहचान बननी प्रारंभ होती है। फिर पख्तूनों ने उत्तर की कबायली जातियों उज्बेक, हजारा और ताजिकों के क्षेत्रों को भी अपने कब्जे में ले लिया। इस क्षेत्र को जिसमें कबीले व उनके इलाके अलग-अलग हैं, रीति-रिवाज व भाषाएं अलग हैं, संयुक्त रूप से अफगानिस्तान कहा गया।

ध्यान देने योग्य है कि अफगान नाम का न तो कोई कबीला है न ही कोई जाति है। 19वीं सदी का उत्तरार्ध ब्रिटिश और रूसी साम्राज्यों के छायायुद्ध या 'ग्रेट गेम' का वह काल है, जहां से अफगानिस्तान का दुर्भाग्य प्रारंभ होता है। दूसरे अफगान युद्ध में अफगानिस्तान के पराजित शासक अब्दुल रहमान के साथ अंग्रेजों से दिनांक 12 नवंबर, 1893 को हुए समझौते के तहत डूरंड रेखा खींची गई जो अफगानिस्तान के दक्षिणी पूर्वी पख्तून एवं बलोच इलाके को दो भागों में बांटती है। यह अफगानिस्तान का अस्वाभाविक बंटवारा था, जिसे आज भी अफगानिस्तान की किसी सरकार ने, न पख्तूनों ने स्वीकार किया है। बल्कि पूर्वी दक्षिणी अफगानिस्तान और पाकिस्तान के पख्तून क्षेत्रों को सम्मिलित कर ‘पख्तूनिस्तान’ की मांग उठती रही है।

अफगानिस्तान के तालिबानीकरण ने पख्तून राष्ट्रवाद की धुरी को कमजोर किया है। पाकिस्तान जेहादी इस्लामिक अभियान के माध्यम से पख्तूनिस्तान की मांग को नेपथ्य में धकेलने में सफल रहा है। लेकिन अब पाकिस्तान के पख्तून क्षेत्रों में असंतोष की उठती आवाजें तेज हो गई हैं। पाकिस्तानी जेल में बंद 35 वर्षीय मंजूर पश्तीन ऐसी ही एक आवाज है।

1947 के बाद बलूचिस्तान आठ माह तक एक आजाद देश रहा है। बलूचिस्तान के नवाब अहमद यार खान ने बलूचिस्तान की आजादी की घोषणा की थी व भारत से सहयोग चाहा था। तत्कालीन भारतीय नेतृत्व में रणनीतिक सोच का घोर अभाव था। फलतः पाकिस्तान ने कश्मीर में भारत से युद्ध लड़ने के दौरान ही सैन्य कार्रवाई कर बलूचिस्तान पर कब्जा कर लिया। पख्तून समाज, डूरंड रेखा के कारण विभाजित है और बलोच राष्ट्रीयता पर पाकिस्तान द्वारा बलपूर्वक कब्जा कर लिया गया है। असल में देखा जाए, तो पख्तून व बलोच अफगान-पाकिस्तान क्षेत्र मंे वे स्वाभाविक राष्ट्र हैं, जिनकी इतिहास की धारा को ब्रिटिश साम्राज्यवाद, फिर शीतयुद्ध के समीकरणों ने बाधित कर दिया है। यदि हम पख्तून और बलोचों की ऐतिहासिक राष्ट्रीयताओं को स्वीकार करें, तो यह क्षेत्र कुल पांच राष्ट्र समूहों का प्रतिनिधित्व करता दिखता है।

पहला पख्तूनिस्तान, फिर उत्तरी अफगानिस्तान के हजारा, उज्बेक व ताजिक कबीलाई क्षेत्र। दूसरा बलूचिस्तान की राष्ट्रीयता है, इसके अतिरिक्त पाकिस्तान के पंजाब व सिंध क्षेत्र।

राॅबर्ट ब्लैकविल, जो भारत में अमेरिकी राजदूत एवं अमेरिका के डिप्टी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे हैं, ने 2010 में अफगानिस्तान को उत्तरी व दक्षिणी अलग-अलग दो कबायली क्षेत्रों में विभाजित करने की बात कही थी। अमेरिका के लिए तालिबानी दक्षिणी पख्तून इलाके पर नियंत्रण कर पाना संभव नहीं है। लेकिन वाशिंगटन उत्तरी पश्चिमी अफगानिस्तान को अफगान सेना और अपनी सशक्त एयरफोर्स के जरिये सुरक्षित कर सकता है। अफगानिस्तान में तब अमेरिकी सेनाओं की संख्या एक लाख से अधिक थी।

अमेरिका तालिबान पर इतना दबाव नहीं बना पाएगा कि वे वार्ता की मेज पर बैठने को सहमत हों। हां, तालिबान एवं पाकिस्तान सैद्धांतिक रूप से असहमत होने के बावजूद इस विभाजन को अपनी विजय के रूप में देखेंगे, जबकि यह पख्तूनिस्तान की शुरुआत होगी। यदि भारतीय अमेरिकी रणनीतिकार उत्तरी अफगानिस्तान को दक्षिणी बृहत्तर पख्तून इलाके के प्रभाव से मुक्त करने की एवं पख्तून एकीकरण पर सहमत हो सकें, तो यह योजना इस अविकसित कबायली क्षेत्र को साम्राज्यवादी हस्तक्षेप से पूर्व के अपने इतिहास की नैसर्गिक प्रगति की राह पर पुनः ले आएगी। स्थायी समाधान के लिए साम्राज्यवाद की उपज, अफगान-पाकिस्तान की नकली राष्ट्रीयताओं के पार देखने की जरूरत होगी। भारत-अमेरिकी रणनीतिक साझेदारी का यह महत्वपूर्ण लक्ष्य हो सकता है। यही स्थायी क्षेत्रीय शांति और विकास का मार्ग होगा।
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