गांधी के बाद अडानी...रामचंद्र गुहा बता रहे हैं दिलचस्प किस्सा

रामचंद्र गुहा Updated Sun, 22 Nov 2020 02:41 AM IST
विज्ञापन
गौतम अडानी
गौतम अडानी

पढ़ें अमर उजाला ई-पेपर
कहीं भी, कभी भी।

*Yearly subscription for just ₹299 Limited Period Offer. HURRY UP!

ख़बर सुनें
हाल ही में फाइनेंशियल टाइम्स ने अपने एक आलेख में सूक्ष्म ब्योरों और निष्पक्षता के साथ नरेंद्र मोदी के मई, 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद से गुजरात के एक कारोबारी की संपत्ति में हुई विस्मयकारी बढ़ोतरी की कहानी बताई है। इस आलेख का एक पैराग्राफ कुछ यूं है, 'श्री मोदी ने जब कार्य संभाला, तो वह गुजरात से राजधानी नई दिल्ली श्री अडानी के निजी विमान से गए- यह मित्रता का खुला प्रदर्शन था, जो सत्ता में उनके समवर्ती उदय का प्रतीक था। श्री मोदी के सत्ता में आने के बाद श्री अडानी की सकल संपत्ति देश भर में सरकारी टेंडर हासिल करने और आधारभूत ढांचे से जुड़ी परियोजनाओं के निर्माण से 230 फीसदी बढ़कर 26 अरब डॉलर हो गई।'
विज्ञापन

मेरी श्री मोदी से कभी मुलाकात नहीं हुई, लेकिन इस आलेख को पढ़ते हुए एक वाकया याद आ गया। यदि मैं चाहता, तो मेरी श्री अडानी से मुलाकात भी होती और मैं उनके साथ काम भी कर सकता था। घटनाक्रम कुछ यूं था। सितंबर, 2013 में मेरी एक किताब आई थी, गांधी बिफोर इंडिया, जो कि काठियावाड़ रियासत में उनकी परवरिश, साम्राज्यवादी लंदन में उनकी शिक्षा और दक्षिण अफ्रीका में एक वकील और कार्यकर्ता के रूप में उनके करिअर पर केंद्रित थी। उसी साल दिसंबर में मुंबई में एक लिटररी फेस्टिवल में मैंने अपनी नई किताब के बारे में बात की। मेरी वार्ता के बाद एक युवक मुझसे मिलने आया और उसने खुद का परिचय एक आकांक्षी लेखक के रूप में दिया। उसने कहा कि वह कुछ महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा करना चाहता है। हालांकि मुझे तुरंत ही बंगलूरू जाने के लिए एयरपोर्ट की ओर निकलना था। मैंने उस युवक को अपना ईमेल दिया, ताकि वह मुझे लिखकर बता सके कि वह क्या बात करना चाहता है। कुछ दिनों बाद उस युवक ने मुझे मेल किया और बताया कि वह एक कंसल्टेंसी फर्म से जुड़ा हुआ है और वे गौतम अडानी की जीवनी से जुड़े प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं। उसने बताया कि उसकी फर्म की श्री अडानी से जीवनी को लेकर बात चल रही है। उसने आगे लिखा, एक जाने-माने लिटररी एजेंट ने संकेत दिए हैं कि अनेक शीर्ष प्रकाशकों की इस प्रोजेक्ट में रुचि है।
उसने लिखा चूंकि उसकी फर्म और अडानी समूह उच्च गुणवत्ता और गहराई से काम किए जाने को लेकर उत्सुक हैं, इसलिए हम एक ऐसे शख्स की तलाश में हैं, जो इस प्रोजेक्ट में हमारे लिए 'मेंटोर' और 'सलाहकार' की भूमिका निभा सके। उन्हें उम्मीद थी कि यह 'मेंटोर' और 'सलाहकार' मैं बन जाऊं। लिहाजा उसने फर्म के एक प्रतिनिधि, श्री गौतम अडानी और मेरे बीच एक मीटिंग प्रस्तावित की।
चूंकि मैं अक्सर गुजरात जाता रहा हूं, (महात्मा गांधी पर शोध को लेकर) तो मुझे गौतम अडानी के बारे में कुछ जानकारी थी। अहमदाबाद के दोस्तों ने मुझे बताया था कि किस तरह से गुजरात सरकार ने तटीय इलाकों में अडानी की परियोजनाओं को तेजी से मंजूरी दी थी, जिसकी वजह से मछुआरों को विस्थापित होना पड़ा था और सदाबहार वनों को नुकसान पहुंचा था।

दिसंबर, 2013 में यह स्पष्ट लगने लगा था कि श्री मोदी भारत के अगले प्रधानमंत्री बनेंगे। और जब ऐसा होगा, तब गौतम अडानी का महत्व बढ़ जाएगा। यह एहसास होने पर कि वह और प्रभावशाली तथा महत्वपूर्ण हो सकते हैं, वह चाहते थे कि उनकी जीवनी का प्रकाशन हो और उनके सलाहकार चाहते थे कि इसके लेखन (या छद्म लेखन) में गांधी के इस जीवनीकार को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए।

गौतम अडानी की जीवनी लेखन जैसा अनचाहा प्रस्ताव मेरे लिए नया नहीं था। गांधी पर काम करना शुरू करने से कई साल पहले मैंने ब्रिटेन में जन्मे मानव विज्ञानी वेरियर एल्विन की जीवनी लिखी थी, जो कि भारतीय आदिवासी लोगों के आधिकारिक जानकार थे। मार्च, 1999 में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से सेवेजिंग द सिविलाइज्ड शीर्षक से लिखी गई वेरियर एल्विन की जीवनी की खासी प्रशंसा हुई थी और स्कॉलरशिप जैसा काम होने के बावजूद इसकी ठीक-ठाक बिक्री हुई। इस किताब के छपने के एक-दो महीने बाद मुझे नई दिल्ली से एक सम्मानित लाइब्रेरियन ने फोन किया, जिन्हें मैं भी थोड़ा बहुत जानता था। लाइब्रेरियन ने मुझसे जानना चाहा कि क्या प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जीवनी लेखन में मेरी कोई दिलचस्पी होगी? श्री वाजपेयी के परिवार ने उनसे कुछ नाम मांगे थे और लाइब्रेरियन को एल्विन की मेरी किताब देखने के बाद मेरा खयाल आया था। वह तब तक ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से बात कर चुके थे और वह भी इस प्रोजेक्ट को लेकर इच्छुक था।

लाइब्रेरियन ने मुझसे कहा था कि प्रधानमंत्री पर केंद्रित किताब में न केवल आम दिलचस्पी होगी, बल्कि संदेह नहीं कि सारे सरकारी दफ्तर और उप दफ्तर इसकी कई-कई प्रतियां खरीदेंगे। अनेक राज्य सरकारों के लिए इसका हिंदी में अनुवाद किया जाएगा और आरएसएस की सभी शाखाएं इसकी प्रतियां खरीदेंगी। इसके एवज में काफी वित्तीय लाभ होगा। लेकिन मैं राजी नहीं हो सका। अनुबंधित जीवनी लेखक सत्ता में बैठे किसी राजनेता की निष्पक्ष और स्वतंत्र जीवनी नहीं लिख सकता।

इसके अलावा, श्री वाजपेयी खुद एक बु्द्धिमान व्यक्ति थे और उनका अपना आकर्षण था, लेकिन मैं उनकी पार्टी भाजपा को पसंद नहीं करता, जिसका हिंदू बहुसंख्यकवादी ब्रांड गांधी के समावेशी और बहुलतावादी हिंदुइज्म से एकदम उलट है। अटल बिहारी वाजपेयी की जीवनी लेखन अनुबंधित जीवनी लेखन के रूप में मुझे मिला पहला प्रस्ताव था। 2002 में क्रिकेट पर मेरी एक किताब आने के बाद, दो क्रिकेटरों ने, जिनमें से एक अब भी खेल रहे थे और दूसरे हाल ही में रिटायर हुए थे, मुझसे पूछा था कि क्या मैं उनकी जीवन की कहानियां बताने में मदद कर सकता हूं। 2007 में स्वतंत्र भारत के इतिहास पर मेरी किताब आने के बाद उसी दौरान दिवंगत हुए एक कांग्रेस नेता के पुत्र ने मुझसे अपने पिता पर केंद्रित किताब लिखने में मदद मांगी थी, तो सेवारत एक कांग्रेस राजनेता चाहते थे कि मैं उन पर किताब लिखूं। इसी तरह से भारत के एक अत्यंत प्रसिद्ध वैज्ञानिक के सहयोगियों ने मुझसे अपने जीवित नायक के 80 वें जन्मदिन पर किताब लिखने के लिए कहा था, जबकि भारत के एक अत्यंत प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री-प्रशासक के परिवार वालों ने हाल ही में दिवंगत हुए इस आचार्य की जीवनी लेखन के लिए कहा था। कुछ अन्य प्रसिद्ध व्यक्तियों, ताकतवर लोगों या अमीर भारतीयों के जीवन पर लिखने के अनचाहे प्रस्ताव भी मुझे मिले हैं।

मैंने ऐसे सारे अनुबंधित प्रस्ताव स्वीकार नहीं किए। कुछ इसलिए खारिज किए, क्योंकि मैं अपने लेखन में पहले से व्यस्त था, तो कुछ इसलिए, क्योंकि मैं जानता था कि मैं उस काम के योग्य नहीं हूं। एक रिटायर क्रिकेटर के अहंकार को तुष्ट करने में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं थी; न ही एक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक की बौद्धिक उपलब्धियों या उनके काम के बारे में लिखने को लेकर मैंने खुद को सक्षम पाया। अनुबंधित या अधिकृत जीवनी को लेकर मेरा सौंदर्यवादी विरोध रहा है। मैं किसी ऐसे व्यक्ति के जीवन के बारे में लिखना पसंद करूंगा, जिसके लिए मेरे भीतर चाह हो, उस व्यक्ति में मेरी व्यक्तिगत दिलचस्पी हो, न कि इसलिए क्योंकि किसी अमीर व्यक्ति ने मुझे ऐसा करने को कहा।

मैंने वेरियर एल्विन पर किताब लिखी, क्योंकि एल्विन ने मेरी जिंदगी बदल दी। अर्थशास्त्र के एक अनमने छात्र के रूप में मेरा सामना उनके काम से हुआ था; एल्विन का लिखा पढ़ने से मैं समाजशास्त्र और सामाजिक इतिहास में आगे के अध्ययन के लिए प्रेरित हुआ। मैंने गांधी पर लिखा, क्योंकि छात्र जीवन से ही उनके जीवन और उनकी विरासत को लेकर मुझमें दिलचस्पी थी। बाद में इतिहासकार के रूप में काम करते हुए मुझे दुनिया भर के संग्रहालयों में गांधी से संबंधित दुर्लभ सामग्रियां मिलीं और इसने मुझे उनकी दो खंडों वाली जीवनी लिखने के लिए प्रेरित किया।

दिसंबर, 2013 में जब मेरे इनबॉक्स में गौतम अडानी की जीवनी लेखन का प्रस्ताव आया, तब तक मैं ऐसे प्रस्तावों को अस्वीकार करने का अनुभवी हो चुका था। इसलिए मैंने उस युवक और उसकी कंसल्टिंग फर्म को जवाब भेजा कि मैं अडानी के उनके प्रोजेक्ट में 'मेंटोर' और 'सलाहकार' के रूप में काम नहीं कर सकता, क्योंकि मैं गांधी की जीवनी के दूसरे खंड के लेखन में व्यस्त हूं। इस प्रस्ताव से संबंधित मूल पत्र मैंने कुछ दोस्तों से साझा किया और लिखा, मुझे लगता है कि इसे स्वीकार करने का एक ही कारण हो सकता है और वह यह कि इसका शीर्षक होगा, ए बॉयोग्राफर्स जर्नी : फ्रॉम गांधी टू अडानी। मेरे एक दोस्त ने कभी लिखी नहीं गई इस किताब का कहीं अधिक चटपटा शीर्षक सुझाया था, अडानी आफ्टर गांधी।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Spotlight

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
Election
  • Downloads

Follow Us

X

प्रिय पाठक

कृपया अमर उजाला प्लस के अनुभव को बेहतर बनाने में हमारी मदद करें।
डेली पॉडकास्ट सुनने के लिए सब्सक्राइब करें

क्लिप सुनें

00:00
00:00
X