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आखिर यह जाति क्यों नहीं जाती

Yashwant Vyas Updated Thu, 30 Aug 2012 12:00 PM IST
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अभी कुछ दिन पहले शाहजहांपुर के खुदागंज कसबे से आई वह खबर रोंगटे खड़े कर देने वाली थी, जिसमें मामूली विवाद के चलते एक व्यक्ति के नाखून उखाड़ दिए गए थे। बच-खुची कसर उसके मुंह पर पेशाब कर पूरी कर दी गई थी। मानवता को शर्मसार करने वाली यह पहली घटना नहीं है। न जाने कितने लोगों का इसी तरह से उत्पीड़न आज भी जारी है, उनमें से कुछ घटनाएं ही खबरों का हिस्सा बन पाती हैं। ऐसे ज्यादातर मामलों में पीड़ितों को सिर्फ इसलिए उत्पीड़ित किया जाता है, क्योंकि वे सामाजिक 'वर्णक्रम' में निचले स्तर पर हैं। उस पीड़ित व्यक्ति का अपराध भी सिर्फ यही था कि वह एक 'दलित' है। जिस देश में हर धर्म से ऊपर मानवता को स्वीकारने का दावा किया जाता है, उसी देश की न्याय व्यवस्था का परिहास उड़ाते हुए दलितों से उनके सांविधानिक अधिकार छीन लिए जाते हैं।
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यों तो अनुसूचित जातियों और जनजातियों का आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक सशक्तीकरण केंद्र और राज्य सरकारों के विकास का एजेंडा रहा है, परंतु दुख की बात यह है कि जातिगत भेदभाव की चुभन देश की स्वतंत्रता के साढ़े छह दशक पूर्ण हो जाने के बाद भी कायम है। देश के ज्यादातर राज्यों की सरकारें अपने यहां अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारक अधिनियम, 1989 को प्रभावी ढंग से लागू नहीं करा पा रही हैं। यही कारण है कि दलितों पर अत्याचार अनवरत कायम हैं।

बीते दिनों राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष ने भी स्वीकार किया था कि गांवों में विभेद की रेखा गहराई से कायम है। दो वर्ष पूर्व सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने भी देश में जातिगत विभेद की पीड़ा पर प्रश्न करते हुए कहा था, 'कानून और लोकतंत्र की व्यवस्था सुचारू रूप से चलाने के लिए हमारे देश में जाति व्यवस्था को जल्दी खत्म किया जाना जरूरी है।'

जातिगत पीड़ा से इस देश को उबारने के लिए न जाने कितने संवेदनशील लोगों ने सपना देखा था। संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर ने जाति-व्यवस्था का उन्मूलन शीर्षक से एक पुस्तक लिखी थी। इस पुस्तक में उन्होंने जाति के उन्मूलन की कल्पना पूर्ण विश्वास के साथ की थी, परंतु जीवन के कटु अनुभवों के चलते उनका विश्वास छिन्न-भिन्न हो गया और अंततोगत्वा उन्होंने हिंदू धर्म त्याग कर बौद्ध धर्म अपनाने का निर्णय लिया।

अब प्रश्न यह उभरता है कि क्यों स्वयं को मानवाधिकार का पैरोकर मानने वाला देश, मानव और मानव के मध्य यों पीड़ाजनक अंतर करता है। इसका स्पष्ट कारण है, तथाकथित उच्च जाति के सबल व्यक्तियों द्वारा अहम के तुष्टीकरण के लिए उन व्यक्तियों का शोषण करना, जो उनकी दृष्टि से कमजोर हैं। सदियों से जातिगत विभेद के आधार पर अनुसूचित जाति के व्यक्तियों को ‘निम्न’ मानकर उन पर शासन करने की तुच्छ मानसिकता आज भी सामंती समाज छोड़ने को तैयार नहीं है।

ऐसे में यह मानसिकता खत्म हो, तो कैसे? निश्चित रूप से समाज की इस मानसिक विकृति को युवा पीढ़ी ही तोड़ सकती है। इसका जीवंत उदाहरण बिहार राज्य है, जिसे सभी दृष्टि से पिछड़ा माना जाता रहा है। वहां के मंदिरों और मठों में दलित पुजारियों की नियुक्ति व संगत और पंगत के मार्ग को अपनाकर सामाजिक समरसता का अनुपम प्रयास किया गया है। बिहार के लगभग सभी धार्मिक ट्रस्टों के सदस्य दलित हैं। देश के नीति-निर्धारकों को इस तथ्य पर भी विचार करना होगा कि सिर्फ आरक्षण और छात्रावासों से दलितों को वह अवसर प्राप्त नहीं होगा, जिनके वह हमेशा से अधिकारी रहे हैं।

जिन दलितों का स्वार्थ एवं दुर्भावनावश सामाजिक बहिष्कार एवं प्रताड़ित किया जाता है, अगर वे सभी अपने-अपने कामों का बहिष्कार कर दें, तो समाज की गति थम जाएगी। यह कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालने वाले लोगों का उत्तरदायित्व बनता है कि वे देश के माथे पर लगे इस कलंक को धो दें कि यह देश ‘मानवीय गरिमा का परिहास’ करता है। माना कि उच्च-निम्न की सदियों की सड़ी गली विचारधारा को हटा पाना सहज नहीं है, परंतु यह काम असंभव भी नहीं है। यदि सामूहिक प्रयास किए जाएं, तो देश में 'एक समाज' की कल्पना आसानी से साकार हो सकती है।

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