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ऐसे हुई आदर्श शिष्य की पहचान

Yashwant Vyas Updated Mon, 27 Aug 2012 12:00 PM IST
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आचार्य बहुश्रुत ने अपने गुरुकुल के छात्रों की शिक्षा पूरी कराने के बाद तीन चुने हुए शिष्यों से कहा, कल प्रातः मेरे निवास स्थान पर आना। तुम्हारी आखिरी परीक्षा लेने के बाद प्रमाणपत्र दिया जाएगा। उनके जाने के बाद आचार्य ने कुटिया के मार्ग पर कुछ कांटे बिखेर दिए। सुबह तीनों शिष्य गुरुकुल आश्रम से गुरुदेव के निवास स्थान की ओर रवाना हुए। कुटिया से कुछ दूर ही पहुंचे थे कि उन्हें पैरों में कांटे चुभते महसूस हुए। पहला शिष्य पैरों में कांटे चुभते जाने के बावजूद कुटिया तक पहुंचकर एक ओर बैठकर कांटे निकालने लगा।
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दूसरा शिष्य पहला कांटा चुभते ही सतर्क होकर उनसे बचता हुआ कुटिया तक पहुंच गया। तीसरे ने जैसे ही कांटा देखा कि उसने वृक्ष की नीचे झुकी एक डाली तोड़ी और उस डाली का झाड़ू की तरह उपयोग कर तमाम कांटे रास्ते से बुहार दिए। मार्ग को कंटक रहित करने के बाद उसने हाथ-पांव धोए तथा आचार्य बहुश्रुत की कुटिया की ओर बढ़ गया।

गुरुदेव कुटिया के द्वार पर खड़े तीनों शिष्यों का आचरण देख रहे थे। उन्होंने तीसरे शिष्य की पीठ थपथपाते हुए कहा, वत्स, तुम आखिरी परीक्षा में सफल रहे। सच्चा ज्ञान वही है, जो दूसरों के संकट को दूर कर सके। तुम्हारे आचरण ने यह सिद्ध कर दिया है कि तुम मार्ग के कांटों को बुहारने की तरह दूसरों के दुःख-दर्द को दूर करने की कला में निपुण होकर मेरे आदर्श शिष्य के रूप में गुरुकुल का नाम ऊंचा करोगे।

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