जैसा अन्न खाएंगे, वैसी बुद्धि होगी

Yashwant Vyas Updated Thu, 23 Aug 2012 12:00 PM IST
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धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि जैसा अन्न हम खाते हैं, हमारी बुद्धि भी वैसी ही हो जाती है। अगर अन्न गलत ढंग से अर्जित धन से आया है, तो हमारी बुद्धि पथभ्रष्ट हो जाती है, जबकि परिश्रम से अर्जित धन से आया अन्न हमें धर्म-कर्म की ओर उन्मुख करता है।
भीष्म पितामह ने यह जानते हुए भी कि कौरव पांडवों के साथ सरासर अन्याय कर रहे हैं, युद्ध में कौरवों का साथ दिया। दुर्योधन जब भरी सभा में द्रौपदी का चीरहरण कर रहा था, तब वह मूक दर्शक बने इस अधर्म को सहन करते रहे।

अपने अंतिम समय शरशय्या पर पड़े भीष्म पितामह धर्मराज युधिष्ठिर के अनुरोध पर उपस्थित जनों को धर्म के मर्म का उपदेश दे रहे थे। द्रौपदी भीष्म पितामह के मुंह से धर्म के महत्व की बात सुनकर हंस पड़ीं। भीष्म पितामह को समझते देर नहीं लगी कि पांचाली उनकी कथनी-करनी के अंतर को याद कर हंस रही है।

भीष्म पितामह ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा, बेटी द्रौपदी, तुम्हारा हंसना बिलकुल सही है। मैं उस समय दुर्योधन का अन्न खाता था। धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि पापी का अन्न खाने से बुद्धि मलिन हो जाती है। मेरी बुद्धि उसी पाप के अन्न के कारण मलिन हुई। दुर्योधन के अन्न से जो रक्त बना था, उसे अर्जुन के बाणों ने शरीर से बाहर निकाल दिया है और अब मेरा शरीर शुद्ध हो गया है। इसलिए मैं आज धर्म और न्याय की बात कहने का अधिकारी हो गया हूं। यह सुनकर द्रौपदी भीष्म पितामह के चरणों में नतमस्तक हो गईं।

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