जो जैसा, उसकी दृष्टि वैसी

Yashwant Vyas Updated Sat, 18 Aug 2012 12:00 PM IST
विज्ञापन

पढ़ें अमर उजाला ई-पेपर
कहीं भी, कभी भी।

*Yearly subscription for just ₹249 + Free Coupon worth ₹200

ख़बर सुनें
नीतिशास्त्रों में कहा गया है कि खुद की अनुभूति कर दूसरे की स्थिति जान लेनी चाहिए। अगर स्वयं अच्छे होंगे, तो पूरी दुनिया भी अच्छी दिखाई देगी, और अगर स्वयं पापकर्म में लिप्त रहेंगे, तो शेष दुनिया भी पापी ही दिखाई देगी। और ऐसे पापी व्यक्ति का कभी कल्याण नहीं हो सकता। इसी से जुड़ा एक प्रसंग महाभारत का है।
विज्ञापन

महाराज युधिष्ठिर ने अश्वमेध यज्ञ किया। यज्ञ में सभी प्रमुख संत-महात्मा, ऋषिगण, विद्वान तथा विभिन्न राज्यों के नरेश उपस्थित थे। भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को कोई अत्यंत मूल्यवान वस्तु दी और कहा कि यहां उपस्थित जनों में से जो सर्वश्रेष्ठ हों, उन्हें यह उपहार के रूप में भेंट कर दो। युधिष्ठिर ने जवाब दिया, यदुनंदन, मुझे इन उपस्थित विभूतियों में से एक भी ऐसा नहीं लगा, जो किसी से कम श्रेष्ठ हो। मुझे सभी गुणी, नीतिवान और धर्म का अनुसरण करने वाले दिखाई दिए। इसलिए मैं इस उपहार को वापस करता हूं।
श्रीकृष्ण ने फिर दुर्योधन को बुलाया तथा उसे भी वही कहा। दुर्योधन कुछ देर बाद वापस लौट आए और कहा, गोविंद, मुझे इनमें से एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिला, जिसमें अवगुण न हों। किसी में कोई अवगुण था, तो किसी में कोई। ऐसी स्थिति में मैं किसे सर्वश्रेष्ठ मानकर उपहार देता? तब भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, यही दृष्टिकोण का अंतर है। जो जैसा होता है, उसे दूसरे भी वैसे ही दिखाई देते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Spotlight

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
Election
  • Downloads

Follow Us