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द्रोणाचार्य की गुरु दक्षिणा

Yashwant Vyas

Updated Tue, 14 Aug 2012 12:00 PM IST
नीतिशास्त्रों में ऐसे अनेक प्रसंग हैं, जिसमें बताया गया है कि किस तरह धर्मगुरुओं ने भविष्य की अनुभूति वर्तमान में ही कर ली और धर्म की रक्षा के लिए कदम उठाया। अपने शिष्यों को भी उन्होंने यही उपदेश दिया कि धर्म की रक्षा के लिए चाहे प्राण लेने पड़े या देने पड़े, पीछे नहीं हटना चाहिए।
गुरु द्रोणाचार्य ने शिष्यों को धर्मशास्त्रों के साथ धनुर्विद्या की भी शिक्षा दी।

उन्होंने देखा कि सभी शिष्यों में अर्जुन अधिक मेधावी हैं। उन्होंने अर्जुन को गुरुकुल से विदा करते समय ब्रह्मशिर नामक दिव्य अस्त्र प्रदान किया, जिसमें समूची पृथ्वी को जला डालने की क्षमता थी। गुरु द्रोण ने अस्त्र प्रदान करने के बाद कहा, वत्स अर्जुन, इस अस्त्र का प्रयोग सोच-समझकर करना। वरना तुम भीषण विध्वंस के पाप के भागी हो जाओगे। अर्जुन ने नतमस्तक होकर उनके आदेश के पालन का आश्वासन दिया। तब गुरु द्रोणाचार्य ने कहा, अब मुझे दक्षिणा चाहिए।

अर्जुन ने विनीत होकर कहा, गुरुदेव, आप जो भी मांगेंगे, मैं उसे देने के लिए तत्पर हो जाऊंगा। द्रोण ने कहा, मुझे वचन दो कि यदि मैं भी किन्हीं परिस्थितियों में वशीभूत होकर धर्मपक्ष के विरुद्ध रणक्षेत्र में खड़ा दिखाई दूं, तो तुम मेरा भी डटकर मुकाबला करने को उद्यत दिखाई दोगे। उस समय मुझे गुरु के रूप में न देखकर अधर्म पक्ष का मानकर मुझ पर प्रहार करने में कोई कसर नहीं रखोगे। यही मेरी गुरु दक्षिणा है। अर्जुन गुरु के ये उद्गार सुनकर हतप्रभ रह गए।
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