इस सौदे से खरा कोई दूसरा नहीं

Yashwant Vyas Updated Tue, 31 Jul 2012 12:00 PM IST
कालू मेहता ने अपने पुत्र नानक के लिए तलवंडी (लाहौर) में एक छोटी-सी दुकान खुलवाई। उन्होंने बेटे को कुछ रुपये दिए और कहा, पहली बार अकेले बाजार भेज रहा हूं। ठोक-बजाकर खरा सौदा करके लौटना। नानक बचपन से ही भगवन्नाम की मस्ती में डूबे रहते थे। उन्हें भूखे और परेशान लोगों में भगवान के दर्शन होते थे। वह तलवंडी से कुछ दूर पहुंचे ही थे कि उन्हें कुछ साधु मिल गए। एक साधु बोला, बच्चा, हम कई दिन से भूखे हैं, कुछ मिल जाए, तो अपना पेट भर लें।

नानक ने तमाम रुपये उन साधुओं के भोजन पर खर्च कर दिए और कुछ देर उनके बीच बैठकर भगवान की चर्चा की और खाली हाथ ही घर लौट आए। पिता ने जब बेटे को खाली हाथ वापस आया देखा, तो डांटते हुए पूछा, मैंने तो तुम्हें सामान लाने के लिए भेजा था, खाली हाथ कैसे आ गए? मैंने जो रुपये तुम्हें दिए थे, वे कहां हैं?

नानक ने जवाब दिया, पिताजी, आपने खरा सौदा करने को कहा था। भूखे साधुओं को भोजन कराकर उन्हें तृप्त करने से खरा सौदा और भला क्या हो सकता था! मैंने वे रुपये ऐसे सौदे पर खर्च किए हैं, जिनसे इस जीवन में भी कल्याण होगा और परलोक में भी।

नानक का यह उत्तर सुनकर कालू मेहता समझ गए कि उनका बेटा साधारण संसारी आदमी नहीं है, कोई महान फरिश्ता है। यही नानक आगे चलकर सिख पंथ के संस्थापक गुरु नानक कहलाए।

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