जो मैंने लिया नहीं, वह तेरा है

Yashwant Vyas Updated Fri, 20 Jul 2012 12:00 PM IST
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नीतिग्रंथों में कई ऐसे प्रसंग हैं, जिनमें छोटी-छोटी घटनाओं के आधार पर आदर्श जीवन जीने का उपदेश दिया गया है। ऐसा ही एक प्रसंग भगवान बुद्ध का है। एक दिन उनके पास एक व्यक्ति पास पहुंचा और किसी बात पर क्रोधित होकर उन्हें गालियां देने लगा। भगवान बुद्ध गालियां सुनकर भी शांतचित्त बैठे रहे। जब वह व्यक्ति गालियां देते-देते थक गया, तो वह शांत हो गया। उसके शांत होते ही बुद्ध ने पूछा, क्यों भैया, क्या कभी तुम्हारे घर कोई अतिथि आता है?
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उस व्यक्ति ने जवाब दिया, हां, क्यों नहीं आते, बहुत अतिथि आते हैं। यह जवाब सुनकर बुद्ध ने फिर जिज्ञासा व्यक्त की, तो तुम उनका सत्कार भी करते होगे। खीझ में उस व्यक्ति ने उत्तर दिया, हां, क्यों नहीं, उन्हें भोजन कराता हूं और सम्मान भी देता हूं।
बुद्ध ने फिर पूछा, यदि तुम कोई वस्तु अतिथि को खाने को दो और वह उसे नहीं खाए, तो वह वस्तु कहां रहेगी? इस बार जवाब मिला, जिन वस्तुओं को अतिथि स्वीकार नहीं करेगा, वे मेरे पास ही रहेंगी। यह सुनकर भगवान बुद्ध गंभीर मुद्रा में उसे समझाते हुए बोले, भैया, तुमने मुझे जो गालियां दी हैं, उन्हें मैं स्वीकार नहीं करता, तुम अपनी गालियां अपने पास ही रखो। यह सुनते ही उस व्यक्ति का सिर लज्जा से झुक गया। उसने भविष्य में किसी के साथ कभी भी दुर्व्यवहार न करने का संकल्प तत्काल ले लिया।
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