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पाप से घृणा करो पापी से नहीं

Yashwant Vyas Updated Thu, 19 Jul 2012 12:00 PM IST
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केवल भारतीय धर्मग्रंथों में नहीं, बल्कि सभी पंथों के ग्रंथों में कहा गया है कि मनुष्य को क्षमाशील होना चाहिए। उसे एक-दूसरे के प्रति सेवा भावना और गरीब-असहाय व्यक्ति की मदद करने को लेकर हमेशा प्रयत्नशील होना चाहिए। एक बार ईसा भ्रमण करते-करते एक नगर में पहुंचे। अनेक व्यक्ति उनके सत्संग में आते तथा उनके उपदेशों से प्रभावित होकर लौटते।
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नगर का साहूकार शहीन यहूदी धर्मात्मा व्यक्ति था। उसने ईसा को भोजन के लिए आमंत्रित किया। ईसा ने भोजन के बाद उसे जीवन में धैर्य तथा क्षमा जैसे गुण अपनाने का उपदेश दिया। इसी नगर की एक नगरवधु मेरी भी ईसा के प्रवचनों से प्रभावित हुई। उसने भी साहस कर ईसा को भोजन का आमंत्रण दिया। सरल हृदय ईसा आमंत्रण स्वीकार कर उसके घर भी चले गए।


ईसा के कुछ शिष्यों में चर्चा होने लगी कि प्रभु को एक बदनाम महिला के घर भोजन करने नहीं जाना चाहिए था। इससे उनकी गरिमा पर आंच आ सकती है। ईसा के कानों में यह बात पहुंची, तो उन्होंने शिष्यों को बुलाया और उन्हें उपदेश दिया, हमें पापी से नहीं, पाप से बचना चाहिए। सत्संग का उद्देश्य ही यह है कि आदमी बुरे कामों को छोड़ दे तथा प्रायश्चित कर अच्छा बन जाए। यदि बुहारी (झाड़ू) गंदगी तक नहीं पहुंचेगी, तो सफाई कैसे करेगी? और उसी दिन मेरी ने भी संयमपूर्वक रहने और लोगों की सेवा करने का संकल्प लिया। वह रोगियों की सेवा में जुट गईं।

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