हीरे और कंकड़ में फर्क नहीं

Yashwant Vyas Updated Wed, 18 Jul 2012 12:00 PM IST
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धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि जो मनुष्य विरक्त होकर ईश्वर की साधना में लगा रहता है, लोभ और मोह के बंधन में नहीं पड़ता, वह एक-न-एक दिन ईश्वर का साक्षात्कार जरूर करता है। ऐसे ही एक विरक्त संत पुरंदर हुए, जो भगवान के सच्चे भक्त तथा विरक्त प्रवृत्ति के महापुरुष थे।
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विजयनगर के राजा कृष्णदेव ने गृहस्थ में रहते हुए भी उनके निर्लोभी होने की बात सुनी, तो उन्होंने संत पुरंदर की परीक्षा लेने का निर्णय किया। उन्होंने संत को दी जाने वाली भिक्षा के चावल में हीरे और रत्न मिलाकर देने का आदेश दिया। एक महीने तक यह क्रम चलता रहा। महीने के अंत में राजा वेश बदलकर संत पुरंदर के घर पहुंचे। उन्होंने दरवाजे में घुसते ही संत पुरंदर की पत्नी की आवाज सुनी। वह पति से कह रही थीं, आजकल आप किस गरीब के यहां से भिक्षा लाते हैं। वह चावलों में कंकड़ मिलाकर देता है। मैं उन्हें चुनते-चुनते परेशान हो जाती हूं।
राजा ने देखा कि कोठरी के एक कोने में उनके द्वारा दिए गए हीरे-मोती का ढेर लगा हुआ था। संत पुरंदर ने राजा को पहचान लिया। वह बोले, महाराज, मैं जानता था कि आप मेरी गरीबी को देखते हुए चुपचाप भिक्षा के चावलों में कुछ हीरा-मोती मिलाकर भेजते हैं, परंतु मुझ ब्राह्मण के लिए हीरे और कंकड़ में कोई अंतर नहीं है। आप इन्हें ले जाएं तथा गांव में मीठे पानी के कुएं खुदवा दें। इन हीरों की सार्थकता इसी में है। राजा संत की विरक्ति भावना के सामने नतमस्तक हो उठे।
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