बलि से प्रसन्न नहीं होतीं देवी

Yashwant Vyas Updated Sun, 15 Jul 2012 12:00 PM IST
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संत गाडगे बाबा का जन्म महाराष्ट्र के एक धोबी परिवार में हुआ था। सामाजिक भेदभाव और ऊंच-नीच की भावना के उन्मूलन के लिए जहां उन्होंने रचनात्मक अभियान चलाया, वहीं धर्म के नाम पर निरीह पशुओं की बलि की भी उन्होंने घोर निंदा की।
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गाडगे महाराज ने झाड़ू पंथ की स्थापना की। वह गरीब बस्तियों में जाते और वहां के घरों में अपने हाथों से झाड़ू लगाकर उन्हें स्वच्छ रहने की प्रेरणा देते। वह जीर्ण-शीर्ण पड़े मंदिरों की सफाई कर देवस्थानों की पावनता का संदेश देते और लोगों को शराब छोड़ने का संकल्प कराते।
एक दिन बाबा अपने शिष्यों सहित एक ऐसे देवी मंदिर में जा पहुंचे, जहां देवी की प्रतिमा के समक्ष बकरे की बलि दी जा रही थी। गाडगे बाबा ने देखा कि एक व्यक्ति बकरे को खींचकर बलि स्थल पर ला रहा है और असहाय बकरा 'मां-मां' कर रो रहा है। बाबा ने उस व्यक्ति को ललकारा, यह पाप कर्म क्यों कर रहे हो? इस निरपराध पशु की हत्या से देवी भला कैसे खुश हो सकती है?
जब वह अंधविश्वासी मानने को तैयार नहीं हुआ, तो गाडगे बाबा बलि स्थल पर खड़े हो गए और बोले, भइया, मेरा सिर उतार लो, बाद में बेजुबान पशु की हत्या करना। देवी मां किसी का जीवन लेने से नहीं, किसी के प्राणों की रक्षा करने से प्रसन्न होती है। ये शब्द सुनते ही उस अंधविश्वासी की आंखें खुल गईं। उसने भविष्य में पशु बलि न देने का संकल्प ले लिया।
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