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चैतन्य महाप्रभु की दरियादिली

Yashwant Vyas Updated Fri, 06 Jul 2012 12:00 PM IST
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पिछड़ी जाति में जन्मे हरिदास भगवान के अनन्य भक्त थे। उन्होंने चैतन्य महाप्रभु से दीक्षा ली। चैतन्य महाप्रभु समाज के सभी तबकों के कल्याण की सोचते थे। वह शहर-शहर घूमकर धर्म का प्रचार करते थे और लोगों को सौहार्द के साथ रहने, गरीबों की अपने हाथों से सेवा करने और मानव मात्र से प्रेम करने की प्रेरणा दिया करते थे।
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एक दिन हरिदास जी उनके चरणों में बैठे हुए थे, तभी भगवान जगन्नाथ का प्रसाद आया। चैतन्य महाप्रभु ने स्वयं प्रसाद ग्रहण करने से पूर्व अपने नवदीक्षित शिष्य हरिदास से कहा, हरिदास, आओ मेरे पास आओ, भगवान का प्रसाद ग्रहण करो। हरिदास ने विनम्रता से जवाब दिया, महाराज, मैं निम्न जाति का हूं। भला आपके तथा ब्रह्मणों के पास बैठकर प्रसाद ग्रहण कैसे कर सकता हूं? आप पत्ते पर प्रसाद रख दें, मैं उसे उठा लूंगा और पंक्ति से दूर बैठकर उसे ग्रहण कर लूंगा।

यह सुनते ही चैतन्य महाप्रभु ने कहा, अरे पगले, तू और मैं, दोनों ही तो श्री हरि के भक्त हैं। तू तो वैसे भी निश्छल हृदय भक्त है। 'हरि बोल-हरि बोल' के उच्चारण ने हम सबको समान बना दिया है। क्या तेरे और मेरे शरीर में कोई भेद हो सकता है? कहते-कहते चैतन्य महाप्रभु ने हरिदास का आलिंगन कर लिया। उसे बिलकुल अपने पास बैठाया और दोनों ने एक ही पंक्ति में बैठकर प्रसाद ग्रहण किया।
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