विज्ञापन

रहम मानव का सबसे बड़ा धन है

Yashwant Vyas Updated Wed, 04 Jul 2012 12:00 PM IST
विज्ञापन
ख़बर सुनें
महात्मा अहमद हमेशा खुदा की याद में खोए रहते थे। वह दर्शन के लिए आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को नेक-नीयत रखने तथा गरीबों की सेवा करने की प्रेरणा देते। संत होते हुए भी वह पड़ोसी सद्गृहस्थों के दुख में बराबर सहभागी होते।
विज्ञापन
एक दिन उनके पड़ोस में रहने वाले व्यापारी बहराम के घर से कोहराम मचने और रोने की आवाज सुनाई दी। वह तुरंत उसके घर जा पहुंचे। पता चला कि बहराम जब खरीदा गया माल ऊंटों पर लादकर घर ला रहा था, तो रास्ते में लुटेरों ने उसे लूट लिया। अब वह कंगाल हो गया था। इस दुख को सहन न कर पाने के कारण वह आत्महत्या के लिए तत्पर था। महात्मा अहमद को घर आया देख उसे सांत्वना मिली।

महात्मा ने उससे पूछा, बहराम, जब तुम पैदा हुए थे, तब कौन-सा धन तुम्हारे पास था, जो आज लुटा है? बहराम ने जवाब दिया, नहीं, धन तो बाद में मैंने अपनी मेहनत से कमाया था। संत अहमद ने फिर पूछा, क्या मेहनत करने वाले तुम्हारे हाथ-पैरों को भी डाकुओं ने लूट लिया है? अरे भले मानस तुम लुटे हो, तुमने किसी का लूटा नहीं। दूसरे, तुम्हारे दिल में रहम है, जो सबसे बड़ा धन है। फिर तुम खुद को कंगाल कैसे बता रहे हो?

महात्मा अहमद के इन शब्दों ने व्यापारी बहराम के तमाम गम को खत्म कर दिया। उस दिन से वह कमाने के साथ-साथ ज्यादा खैरात (दान) करने वाला सच्चा इनसान बन गया।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Spotlight

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Disclaimer


हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर और व्यक्तिगत अनुभव प्रदान कर सकें और लक्षित विज्ञापन पेश कर सकें। अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।
Agree
Election
  • Downloads

Follow Us