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संत अष्टावक्र की निर्भीकता

Yashwant Vyas Updated Mon, 02 Jul 2012 12:00 PM IST
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मिथिलापुरी के राजा जनक हाथी पर सवार होकर कहीं जाने वाले थे। उनकी यात्रा में व्यवधान न आए इस आशंका से राज कर्मचारी तमाम रास्ते से लोगों को हटाते जा रहे थे। वे लोगों को बताते जा रहे थे कि राजा की सवारी आने वाली है, इसलिए वे किनारे ही रहें। घर से बाहर अपने कामों के लिए निकले नागरिकों को इससे असुविधा हो रही थी, परंतु भय के कारण वे कुछ बोल नहीं पा रहे थे।
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ऐ पंडित जी महाराज, आप इस पथ से एक तरफ खड़े हो जाएं, महाराज की शोभा यात्रा गुजरने के बाद ही आप इस पथ का उपयोग करें- एक राज कर्मचारी ने तिलकधारी व्यक्ति को देखकर कहा। वह तिकलधारी व्यक्ति और कोई नहीं, महान ज्ञानी अष्टावक्र थे। राज कर्मचारी की डांट को हंसकर स्वीकार करते हुए उन्होंने निर्भीकतापूर्वक उत्तर दिया, राजा की सुविधा के लिए नागरिकों को परेशान किया जाना अनुचित है। मैं इस पथ से कदापि नहीं हटूंगा।

क्रोधित राज कर्मचारी उन्हें पकड़कर दरबार ले आए। राजा जनक के सामने उन्हें बंदी की तरह पेश किया गया। जनक जी ने जब सारा किस्सा सुना, तो वह सिंहासन से उठे और अष्टावक्र के चरणों में गिर पड़े। उनकी आंखों से अश्रु की धारा निकल रही थी। रुंधे स्वर में उन्होंने कहा, महाराज, मुझे आप जैसे निर्भीक ब्राह्मण की आवश्यकता थी, जो 'राजगुरु' बनकर राजा को उसका कर्तव्य-बोध कराता रहे। अष्टावक्र ने उन्हें गले से लगा लिया।

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