सेवा भावना और विनयशीलता

Yashwant Vyas Updated Wed, 27 Jun 2012 12:00 PM IST
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वर्ष 1938 में हिसार (हरियाणा) में भीषण अकाल पड़ा। स्वाधीनता सेनानी लाला हरदेव सहाय पंडित नेकीराम शर्मा तथा अन्य कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के साथ वहां पहुंचे। लाला जी कई-कई मील पैदल चलकर अकाल क्षेत्रों में पहुंचते और लोगों को अन्न तथा जानवरों को चारा देते। उनकी सहायता टीम में एक संन्यासी भी था। एक दिन संन्यासी ने देखा कि लाला हरदेव सहाय एक झोंपड़ी में भूख से तड़पते एक बालक को गोद में लेकर चम्मच से दूध पिला रहे हैं। यह देख उस संन्यासी ने लाला जी से कहा, मैं प्रतिदिन गीता और रामायण का पाठ करता हूं, पर मेरे हृदय में कभी भी आप जैसी करुणा भावना पैदा नहीं हुई कि अपने हाथों से किसी भूखे को दूध पिलाऊं।
लाला जी बोले, महाराज, आप जैसे साधु-संतों के सत्संग तथा शास्त्रों के अध्ययन से ही तो मुझे प्राणी मात्र में ईश्वर के दर्शन करने तथा पीड़ितों की सेवा की प्रेरणा मिली है। वह संन्यासी हरदेव सहाय की विनयशीलता देखकर दंग थे। लाला हरदेव सहाय ने अपना संपूर्ण जीवन मानव मात्र की सेवा और रक्षा के लिए समर्पित किया। जब वह पंजाब के मियांवली जेल में बंद थे, तब उनकी मुलाकात स्वामी श्रद्धानंद जी से हुई। उन्होंने लाला जी से वायदा लिया कि वह गांव में हिंदी विद्यालय खोलेंगे और बच्चों को नैतिक संस्कार देने के लिए प्रयत्नशील रहेंगे। इसे पूरा करने के लिए उन्होंने हिसार क्षेत्र के 65 गांवों में विद्यालय खोले।

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