दस्तगीर साहिब दरगाह

Yashwant Vyas Updated Tue, 26 Jun 2012 12:00 PM IST
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श्रीनगर के खानयार में स्थित 200 वर्षों से भी ज्यादा पुरानी दरगाह में सोमवार सुबह आग लग जाने के कारण काफी नुकसान पहुंचा। हालांकि शेख अब्दुल कादिर साहब के पवित्र अवशेष (उनकी दाढ़ी का पवित्र बाल और टोपी) और पवित्र कुरान की हस्तलिखित प्रति अग्नि-रोधी कक्ष में रखे होने के चलते सुरक्षित हैं।
सूफी संत शेख सैयद अब्दुल कादिर जीलानी की यादों को समेटे इस दरगाह का निर्माण 18वीं शताब्दी में किया गया था। इसे सामान्यतः दस्तगीर साहिब दरगाह के नाम से जाना जाता है। शेख अब्दुल कादिर को सूफी मत के कदरिया शाखा का जनक माना जाता है। माना जाता है कि शेख अब्दुल कादिर साहब इस दरगाह में कभी नहीं आए, लेकिन उनके एक शिष्य शेख सखी शाह ने उनसे जुड़ी यादगार वस्तुओं को इस दरगाह में संग्रहीत किया था। तबसे इस दरगाह का नाम दस्तगीर साहिब दरगाह पड़ गया। 11वीं शताब्दी के इस संत को जहां मुसलमान गौस-ए-आजम कहते हैं, वहीं हिंदू काहनूव संत कहते हैं।

यह दरगाह देवदार की लकड़ियों से निर्मित है। इसका बाहरी हिस्सा हलके सफेद और हरे रंग का है, जबकि अंदरूनी हिस्सा कागज की लुगदी (पेपरमैसी) से शानदार ढंग से सुसज्जित किया गया है। अरबी भाषा में लिखी पंक्तियां और फूलों की नक्काशी इस दरगाह की खूबसूरती को चार चांद लगाती हैं। इस दरगाह में एक वर्गाकार मुख्य कमरा और कई सहायक कमरे हैं। ये कमरे हॉलनुमा हैं, जिनका उपयोग बैठकों के लिए किया जाता है।

सदियों से सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक रही यह खूबसूरत दरगाह हिंदू-मुसलिम श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र रही है। हर साल उर्स के मौके पर यहां हजारों लोगों की भीड़ जुटती है।

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