कर्तव्यपालन का पुण्य लाभ

Yashwant Vyas Updated Sun, 24 Jun 2012 12:00 PM IST
जो व्यक्ति निरीह लोगों का उत्पीड़न करने वालों से संघर्ष करते हुए मृत्यु को प्राप्त होता है, उसकी स्वतः सद्गति हो जाती है। न्याय की रक्षा के लिए प्राण देने वाला वीरगति को प्राप्त होता है।

पुराण का एक आख्यान हैः अंबरीष धर्मात्मा और प्रजा पालक शासक थे। वह अपना जीवन धर्मानुसार बिताते थे और भगवान की भक्ति में लीन रहते थे। दीन-दुखियों व अभावग्रस्तों की स्वयं अपने हाथों से सेवा के लिए तत्पर रहते थे। एक बार वह अपने सेनापति से क्षुब्ध हुए, तो उसे पद से हटा दिया। लेकिन नौकरी से निकाले जाने के बाद भी वह सेनापति निरीह लोगों का उत्पीड़न करने वाले लोगों से संघर्ष करने के लिए हमेशा तत्पर रहता था। एक दिन ऐसे ही किसी दुष्ट के साथ संघर्ष करते हुए उसकी मृत्यु हो गई।

बाद में राजा अंबरीष की मृत्यु हुई, तो अपनी भक्ति और अन्य सत्कर्मों की वजह से वह स्वर्ग पहुंचे। वहां उन्होंने देखा कि उनका पूर्व सेनापति स्वर्ग के राजा के बराबर वाले सिंहासन पर विराजमान है। वह आश्चर्य में पड़ गए कि जिस सेनापति ने कभी पूजा नहीं की, उसे स्वर्ग में इतना उच्च आसन क्यों दिया गया?

इंद्र ने जिज्ञासा का समाधान करते हुए बताया, आपने भले ही उसे सेनापति पद से हटा दिया, किंतु उसने अपना सैनिक धर्म कभी नहीं त्यागा। प्रजा के लोगों की रक्षा करते हुए उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए। इसी कारण उसे स्वर्ग में उच्च स्थान मिला है।

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