सभी में सद्भावना का विस्तार

Yashwant Vyas Updated Fri, 22 Jun 2012 12:00 PM IST
शास्त्रों में जहां नश्वर शरीर को महत्व न देकर आत्मज्ञान की प्राप्ति में लगे व्यक्ति को ज्ञानी बताया गया है, वहीं मानव जीवन को सुखद बनाने की भी प्रेरणा दी गई है। अथर्ववेद के एक मंत्र में कहा गया है, जीवेम् शरदः शतम्, यानी वर्षों तक जीवन यात्रा करें। उत्तरोत्तर उत्कृष्ट उन्नति को प्राप्त करते रहें। शरीर को पुष्ट रखते हुए आनंदमय जीवन व्यतीत करते रहें और ऐश्वर्य तथा सद्गुणों से खुद को भूषित करते रहें।
ऋषि एक मंत्र में कहते हैं, घृतं च मे, मधु च मे, गोदूधमाश्च मे, सुख च मे, ह्रीश्च मे, श्रीश्च में, धिंषणाच मे, अर्थात मुझे घी चाहिए, गेहूं चाहिए, सुख चाहिए, विनय चाहिए, संपत्ति-बुद्धि चाहिए, सब कुछ चाहिए। ऋषि एक अन्य वेदमंत्र में कहते हैं, हम प्रसन्नचित्त रहते हुए प्रतिदिन उगते हुए सूर्य के दर्शन करें, यानी उल्लास के साथ प्रत्येक दिन का स्वागत करें। हमारी जीवनचर्या ऐसी हो, जिससे हम स्वस्थ बने रहें तथा अपने धर्म का सुचारू रूप से निर्वहन करते रहें।

ऋग्वेद के मंत्र में आह्वान किया गया है, हे मनुष्यो, जैसे दिव्य शक्तियों से संपन्न सूर्य, चंद्र, वायु, अग्नि आदि देव परस्पर अविरोध भाव से अपने-अपने कार्य करते हैं, वैसे भी तुम भी समष्टि भावना से प्रेरित होकर अपने कार्यों से प्रसन्न रहो और सद्भाव बरतो। ऋषि प्रार्थना करते हैं, भगवन, ऐसी कृपा कीजिए, जिससे मैं मनुष्य मात्र के प्रति सद्भावना रख सकूं।

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