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आदर्श दिनचर्या के सूत्र

Yashwant Vyas Updated Wed, 20 Jun 2012 12:00 PM IST
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भगवान शिव अधिकांश समय सत्संग में बिताया करते थे। एक दिन पार्वती जी ने उनसे पूछा, गृहस्थ को क्या-क्या कार्य करने चाहिए, जिससे उसका कल्याण हो जाए? महादेव ने कहा, देवताओं का स्मरण करना चाहिए। वृद्धजनों, माता-पिता आदि की सेवा करनी चाहिए। संतों का आचरण, सुझाव, उपदेश अपने जीवन में उतारना चाहिए। कुलधर्म, शिष्टाचार तथा सदाचार का सदा पालन करना चाहिए।
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दिनचर्या में शौच की महत्ता बताते हुए महादेव कहते हैं, शौच दो प्रकार का होता है- एक बाह्य, और दूसरा आभ्यंतर। आहार ग्रहण करना और शरीर को स्वच्छ रखना बाह्य शौच है। अंतःकरण, बुद्धि, चित्त तथा अहंकार की निर्मलता आंतरिक शौच है। अर्थात, काम, क्रोध, राग-द्वेष आदि दोषों से बचना आभ्यंतरिक शौच कहलाता है।
वह कहते हैं, संसार में प्राणियों का जीवन और दिनचर्या दो प्रकार की होती है। एक है, दैव भाव पर आश्रित और दूसरी है, असुरभाव पर आश्रित। जो मन, वाणी और क्रिया द्वारा सबके प्रतिकूल आचरण करता है, दूसरों को दुख पहुंचाता है, वह आसुरीभाव का मनुष्य है। वह नरकगामी होता है। इसके विपरीत जो मन, वाणी और कर्म द्वारा हमेशा सबके अनुकूल आचरण करता है, सभी को सुख पहुंचाने को तत्पर रहता है, वह लोक-परलोक में उत्तम गति प्राप्त करता है। समस्त कामनाओं का परित्याग करके ही मनुष्य ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर सकता है।
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