विनम्रता बनाती है निष्ठावान

Yashwant Vyas Updated Fri, 15 Jun 2012 12:00 PM IST
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गुरुनानक देव विनम्रता की साक्षात मूर्ति थे। अहंभाव उन्हें छू भी नहीं पाया था। वह प्रतिदिन प्रार्थना के दौरान भगवान से यही कहते कि हे ईश्वर, मुझे हमेशा दुर्गुणों से वंचित रखना एवं सद्गुणों से सुशोभित करना। मेरे मन में कभी अहंभाव न आए और मैं सबसे विनम्रता से पेश आऊं। हे प्रभु, मुझे अपनी दया का दान दे। मेरे हृदय में हमेशा तेरा निवास रहे।
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न मुझमें ब्रह्मचर्य-सत्य है, न ज्ञान। मैं अज्ञानी हतभाग्य हूं। हे प्रभो दयानिधे, मैं आपके विनम्र शरण की याचना करता हूं।
वह कहते हैं, मेरा जीवन और शरीर तेरे अधीन है। तू मेरे दूर, निकट और मध्य में है। मैं पथिकों से पूछता हूं, मुझे ईश्वर के पास पहुंचने का रास्ता बता दो। मैं उनका पथ अनुसरण करता हूं, जिन्होंने ईश्वर का प्रेम पाया है। मैं उनसे याचना करता हूं कि मुझे भी उस कृपालु ईश्वर तक पहुंचाए।
जैसे पुष्प में सुगंध का वास है, जैसे दर्पण में प्रतिबिंब का वास है, उसी प्रकार हृदय में भगवान का वास है। तो भगवान को बाहर ढूंढने में समय क्यों लगाया जाए? जो भक्ति में निष्ठा रखता है, उसका मार्ग सुगम है। वह ससम्मान रहता है और ससम्मान ही इस लोक से विदा होता है। भक्त भक्ति पथ पर सीधा चलता है, गलियों में नहीं भटकता। सच्चा भक्त सर्वव्यापी आत्मा को पा लेने में सर्वथा सक्षम होता है। गुरु नानक अपने शिष्यों से कहते हैं, कमल की तरह तू मृत्युलोक में शुद्ध और निर्लिप्त रह, कीचड़ से अपना सिर ऊपर रख।
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