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सदाचार से सद्गुण विकास

Yashwant Vyas Updated Thu, 14 Jun 2012 12:00 PM IST
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नीतिशास्त्र में कहा गया है कि सदाचार और सद्गुण एक दूसरे के पर्याय हैं। शीलवान एवं सदाचारी व्यक्ति में स्वाभाविक रूप से सद्गुणों का विकास होता है। जो सदाचार का पालन करता है, वह लोभ, लालच जैसे दुर्गुणों से स्वतः बचा रहता है।
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ब्रह्मलीन संत स्वामी रामसुखदास लिखते हैं, आचरण दो प्रकार के होते हैं-अच्छे आचरण और बुरे आचरण। अच्छे आचरण को सदाचार कहा जाता है, जबकि बुरे आचरण को दुराचार कहा जाता है। सदाचार से सद्गुण दृढ़ होते हैं, जबकि बुरे आचरण में लिप्त रहने वाला अपने स्वाभाविक गुणों से भी हाथ धो बैठता है।
दुर्गुण-दुराचार स्वयं मनुष्य द्वारा उत्पन्न होते हैं। इच्छाओं, लालसाओं तथा सांसारिक सुविधाओं में सुख का भ्रम ही दुराचार की ओर प्रवृत्त करता है। सद्गुण कुसंग के प्रभाव से शिथिल हो जाते हैं, किंतु नष्ट नहीं होते। जबकि दुर्गुण सत्संग तथा सदाचार का दृढ़ता से पालन करके सर्वथा नष्ट हो सकते हैं।
श्रीकृष्ण गीतोपदेश में कहते हैं, यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः, यानी श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करते हैं, अन्य पुरुष भी वैसा ही आचरण करते हैं। इसलिए सदाचार को मानव जीवन की सार्थकता का प्रमुख सूत्र माना गया है। सदाचारी और सद्गुणी व्यक्ति का लोक-परलोक, दोनों कल्याणकारी होता है। अतः मनुष्य को सद्गुणों का संग्रह और दुर्गुणों का त्याग दृढ़ता से करना चाहिए।
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