सबसे बड़ी कला आत्मनियंत्रण

Yashwant Vyas Updated Tue, 12 Jun 2012 12:00 PM IST
आत्मनियंत्रण को सर्वोपरि माना गया है। नीतिशास्त्रों में कहा गया है कि जो व्यक्ति अपने मन, वाणी और कर्मों पर आत्मनियंत्रण के जरिये संयम रखता है, वह कभी कार्यों में सफल होता है। जो व्यक्ति आत्मनियंत्रण की कला नहीं सीख पाया, उसका ज्ञान अधूरा है।

एक बार भगवान बुद्ध का एक प्रतिभाशाली भक्त समुद्र पार के किसी देश में पहुंचा। वहां वह कुछ दिन काष्ठ शिल्पियों की एक बस्ती में रहा। उसने उनसे नौकाएं एवं छोटा जलयान बनाने की कला सीखी। इसी तरह वह सोलह विभिन्न देशों में पहुंचा। वह जिस भी देश में जाता, वहां के लोगों से कुछ न कुछ सीख लेता था। लगातार कुछ सीखने की ललक के कारण वह अनेक देशों की भाषाएं बोलने, समझने में भी पारंगत हो गया। जो कोई भी उसका भाषण सुनता, मंत्रमुग्ध हो जाता।

अंत में वह युवक भारत लौटा। बौद्ध विहार में भिक्षुओं के बीच अपने ज्ञान का बखान करते हुए उसने कहा कि वह भगवान बुद्ध का सबसे विद्वान शिष्य है। भगवान बुद्ध को जब उसके अहंकार का पता चला, वह उसके पास गए और पूछा, विदेशों से क्या आत्मविजय की कला में भी माहिर होकर लौटे हो? उसने भगवान बुद्ध से पूछा, यह आत्मविजय की कला क्या होती है? बुद्ध ने समझाया, जो अपनी प्रशंसा से सुखी और निंदा से दुखी नहीं होता, वही आत्मविजयी होता है। भगवान बुद्ध के शब्दों ने युवक के अहंकार को चूर-चूर कर दिया।

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