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दुखी लोगों में ईश्वर दर्शन

Yashwant Vyas Updated Mon, 11 Jun 2012 12:00 PM IST
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वेदों, शास्त्रों में कहा गया है कि जब प्राणिमात्र को हम अपने समान समझने लगेंगे, तो किसी के अहित की कल्पना तक नहीं कर पाएंगे। यजुर्वेद में भी कहा गया है कि प्रभो, मेरी दृष्टि दृढ़ कीजिए। मैं सभी प्राणियों के प्रति सद्भाव रखते हुए उन्हें हितैषी मानूं और वे भी मुझे मित्र मानें।
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ईशावास्य उपनिषद् में भी कहा गया है कि जो संपूर्ण प्राणियों में अपनी आत्मा के दर्शन करता है, वह किसी से घृणा नहीं करता।

भगवान कपिलदेव माता देवहुति से कहते हैं, ईश्वर समस्त प्राणियों में, उनकी आत्मा के रूप में सर्वदा स्थित रहते हैं। जो किसी भी प्राणी का तिरस्कार करता है, वह भगवान को पूजा से कैसे प्रसन्न कर सकता है! जो स्वयं को अहंकार के कारण दूसरों से अलग समझता है, दूसरे के शरीर में स्थित ईश्वर से ही द्वेष करता है। प्राणियों के प्रति वैर भाव रखने वाले उस मनुष्य का मन कभी शांति प्राप्त नहीं कर सकता।

पुराण में एक कथा है, एक बार अनेक भक्तों ने महादेव की कृपा प्राप्ति की आकांक्षा में घोर तप किया। वे सभी भगवान के अभिषेक के लिए मंदिर पहुंचे। रास्ते में बैठे एक कोढ़ी के पास पहुंचते ही दुर्गंध के कारण वे नाक सिकोड़ लेते। एक भक्त उस कोढ़ी का दुख देखकर उसे अपने घर ले गया और घावों को अपने हाथों से साफ किया। अचानक वहां महादेव प्रकट हुए और बोले, मुझे वही भक्त प्रिय है, जो दुखियों में मेरा दर्शन करता है। तुमने उस दुखी कोढ़ी की नहीं, बल्कि मेरी सेवा की है।

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