संग्रह न करो, देते रहो

Yashwant Vyas Updated Sun, 10 Jun 2012 12:00 PM IST
उपनिषद् में ऋषि कहते हैं, मानव जीवन उसी का सार्थक है, जो किसी न किसी रूप में दूसरों को कुछ न कुछ देता रहता है। समाज में भी उसी को प्रतिष्ठा मिलती है, जो समाज कल्याण के कामों में योगदान करता रहता है। गीता में साफ कहा गया है कि सब कुछ परमात्मा का है। अपना कुछ है ही नहीं-यह मानकर देते रहने वाला अमर हो जाता है।
स्वामी विवेकानंद कहते हैं, आपके पास आवश्यकता से अधिक जो कुछ भी है, उसे लाभ की इच्छा किए बिना दूसरों को दे दीजिए। प्रकृति के नियम इतने दृढ़ हैं कि अगर आप स्वेच्छा से न देंगे, तो जबरदस्ती वह आपसे छीन लेगी। प्रकृति कृतज्ञता ज्ञापन के रूप में आपके दिए हुए के बदले देने को तत्पर रहती है। सूर्य समुद्र का जल खींचता है, फिर उसी जल से पृथ्वी को, हमारे खेतों को तर कर देता है। एक से लेकर दूसरे को देना, यह प्रकृति का नियम है।

स्वामीजी कहते हैं, कमरे की हवा जितनी बाहर निकलती रहेगी, बाहर से उतनी ही शुद्ध हवा भीतर आती रहेगी। परंतु यदि हवा का संग्रह करने के उद्देश्य से आप अपने घर का दरवाजा बंद कर लेंगे, तो बाहर की शुद्ध प्राणवायु तो आएगी नहीं, घर के अंदर की हवा भी दूषित हो जाएगी। दूसरों को देने की पुण्यदायक इच्छा में अनेक बाधाएं आएंगी, किंतु दृढ़ संकल्प लेकर देते रहना चाहिए। केवल धन-संपत्ति ही नहीं, ज्ञान-विद्या भी समाज में निरंतर बांटकर हमें अपने मानव जीवन को सार्थक बनाने को तत्पर रहना चाहिए।

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